भारत में पहली बार एक्जिट प्रोसीजर सफलय बीएलके हॉस्पिटल को बड़ी सफलता

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देहरादून देवभूमि खबर।बीएलके सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के पीडियाट्रिक सर्जरी और नियोनटालॉजी टीम को एक बड़ी सफलता मिली जब बड़ी गर्दन वाले एक शिशु का सफलतापूर्वक प्रसव किया गया। नवजात की बड़ी गर्दन उसकी श्वसन क्रिया को अवरुद्ध कर रही थी और ऐसे में डॉक्टरों की टीम ने उस शिशु पर एक्स्ट्रा यूटेरिन इंट्रा पार्टम ट्रीटमेंट (एक्जिट) नामक दुर्लभ और मुश्किल प्रक्रिया को अंजाम दिया और उस शिशु को एक नया जीवन दिया। बिहार की 29 वर्षीय महिला, जो 30 हफ्ते की गर्भवती थी, के एंटीनटाल अल्ट्रासाउंड में पता चला था कि भ्रूण के गले का द्रव्यमान ज्यादा है। मरीज को आगे के इलाज के लिए बीएलके सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल रैफर किया गया। मरीज की और जाँचें की गईं। भ्रूण का एमआरआई किया गया। जिसमें यह पुष्टि हो गई कि गर्भस्थ शिशु की बड़ी गर्दन का द्रव्यमान अनुमानित रूप से 10 गुणा 9 सेमी का है। शिशु की श्वसन क्रिया को यह द्रव्यमान बाधित कर रहा था, जिस वजह से श्वास नली दिख नहीं रही थी। शिशु का सामान्य प्रक्रिया से प्रसव कराना उसके लिए जानलेवा हो सकता था क्योंकि गर्दन के द्रव्यमान ने श्वास नली को पूरी तरह ब्लॉक कर रखा था। ऑक्सीजन पास ही नहीं हो पा रही थी। शिशु के जीवित रहने के अवसर काफी कम रह गए थे। ऐसे में गर्भ में ही उसकी श्वास प्रक्रिया में आ रही बाधा को दूर करना जरूरी हो गया था। इस दौरान गर्भनाल का संचालन भी जस का तस रखा जाना आवश्यक था। बीएलके के सर्जनों और नियोनटलॉजिस्ट की टीम ने शिशु और ऑक्सीजन की बीच सेतु का काम किया और चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया के जरिये प्रसूति कराई। बीएलके सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के पीडियाट्रिक सर्जरी डिपार्टमेंट में सीनियर कंसल्टेंट डॉ. प्रशांत जैन ने कहा- “जब शिशु गर्भ में था, वह गर्भनाल के जरिये माँ की मदद से श्वास ले रहा था। लेकिन गर्भ से बाहर निकलते ही उसे अन्य शिशुओं की तरह खुद ही श्वास लेना पड़ती। यह ‘एक्जिट’ प्रक्रिया के बिना शिशु के लिए जानलेवा साबित हो सकता था। प्रसव के बाद श्वसन प्रक्रिया के अवरोधों को दूर करना मुश्किल था क्योंकि गर्दन का स्वरूप ही बिगड़ा हुआ था। इसके अलावा ब्रेन हायपोक्सिया से बचाने के लिए 25-30 सेकंड से ज्यादा समय नहीं था। ऐसे में एक्जिट प्रक्रिया ही इकलौता विकल्प था। इसमें हमारे पास इनट्यूबेशन प्रक्रिया को अंजाम देने के लिए तुलनात्मक रूप से ज्यादा वक्त उपलब्ध था।” बीएलके सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के नियोनटालॉजी विभाग के कंसल्टेंट डॉ. कुमार अंकुर ने बताया- “इस केस में विशेष सी-सेक्शन जरूरी था। ताकि फीटो-प्लेसेंट्रल सर्कुलेशन को जारी रखा जा सके। यह यूटेरिन रिलेक्सेंट्स के साथ सामान्य एनेस्थेशिया के साथ ही संभव था। लेकिन इसमें माँ को ब्लीडिंग होने का खतरा भी बहुत ज्यादा था। नवजात की सफल विंडपाइप प्रक्रिया और प्रसव के बाद, गर्दन में मौजूद नॉन-कैंसर ट्यूमर को भी ऑपरेशन के जरिये निकाला गया। इनट्यूबेशन भी दूर किया गया ताकि विंडपाइप पूरी तरह से अवरोधों से मुक्त हो सके।

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