सकारात्मकता की शक्ति:ओशो का चिंतन:

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सकारात्मक सोच रखने वाले अच्छे माता-पिता, अच्छे पति-पत्नी और अच्छे अधिकारी साबित होते हैं, जबकि नकारात्मक लोगों की पूरी ऊर्जा लोगों को गलत साबित करने में ही व्यय होती है। हम चाहें, तो अपने व्यक्तित्व को सकारात्मकता की ओर मोड़ सकते हैं। ओशो का चिंतन..

हमारा मन एक कंप्यूटर की तरह काम करता है और हमारा सोचने का ढंग इसके लिए इनपुट्स का काम करता है। हमारे विचार इसमें इकट्ठे होते रहते हैं और धीरे-धीरे वे गहराई से जम जाते हैं। व्यक्तित्व को हम दो श्रेणियों में बांट सकते हैं। एक वह, जिसे मनोविज्ञानी टी-व्यक्तित्व कहते हैं। यह विषैला व्यक्तित्व है। दूसरा वह है, जिसे मनोविज्ञानी एन-व्यक्तित्व कहते हैं, यह पुष्टिकर होता है।

विषैला टी-व्यक्तित्व हमेशा चीजों के प्रति नकारात्मक नजरिया रखता है। विषैले व्यक्तित्व का दुनिया को देखने का नजरिया निराशावादी और उदासीन होता है। पराकाष्ठावादी होना विषैले व्यक्तित्व का एक उदाहरण है। तुम यह नहीं कह सकते कि पराकाष्ठावाद में कुछ गलत है, लेकिन उसका एकमात्र लक्ष्य ही गलतियां निकालना है।

आप ऐसे व्यक्ति में गलतियां नहीं ढूंढ सकते, जो पूर्णता की तलाश में है। परंतु वास्तव में पूर्णता उसका उद्देश्य नहीं है, यह एक साधन मात्र है। वह सिर्फ त्रुटियों, गलतियों और अभावों को देखना चाहता है। यह सबसे अच्छा तरीका है, पराकाष्ठावाद को एक लक्ष्य की तरह रखना, ताकि वह हर चीज की अपने आदर्श से तुलना करके उनकी निंदा कर सके।

विषैला व्यक्तित्व हमेशा उन चीजों को देखता है, जो नहीं हैं। मौजूद चीजें कभी उसकी नजर में नहीं आतीं, इसलिए उसमें असंतोष स्वाभाविक और स्थायी बन जाता है। विषैला व्यक्तित्व अपने आपको ही विषाक्त नहीं बनाता, बल्कि दूसरों को भी विषाक्त कर देता है।

यह एक विरासत की तरह भी हो सकता है। अगर तुम अपने बचपन में नकारात्मक लोगों के साथ जिए हो, तो यह नकारात्मकता चमकदार शब्द, सुंदर भाषा, आदशरें, स्वर्ग, धर्म, भगवान, आत्मा आदि के पीछे भी छिपी हो सकती है। विषैले लोग सुंदर शब्दों का प्रयोग कर सकते हैं, लेकिन वह सिर्फ प्रयास मात्र है। वे सिर्फ इस दुनिया की निंदा करने के लिए दूसरी दुनिया के विषय में बात करते हैं। वे दुनिया के बारे में चिंतित नहीं हैं। उनका संत-महात्माओं से कुछ लेना-देना नहीं है, लेकिन सिर्फ दूसरों को पापी सिद्ध करने के लिए वे संतों की बातें करते हैं।

यह बहुत रुग्ण रवैया है। वे कहेंगे जीसस की तरह बनो, जबकि वे जीसस में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं रखते। सिर्फ तुम्हारी निंदा करने के लिए यह उनका एक उपाय मात्र है। तुम उनके शिकार बनते हो, क्योंकि तुम जीसस नहीं बन सकते। वे हमेशा तुम्हारी निंदा करते रहेंगे। वे मान-मर्यादा, आचार, नीति, नैतिकतावादी नजरिया बनाते हैं। वे समाज के ठेकेदार बनने का प्रयास करते हैं, उन्हीं का दुनिया को विषाक्त बनाने में सबसे बड़ा हाथ है।

ये लोग हर जगह हैं। ऐसे लोग शिक्षक, शिक्षाविद, प्रोफेसर, कुलपति, संत, बिशप, पोप वगैरह कोई भी हो सकते हैं। वे ऐसा बनना चाहते हैं, ताकि वे निंदा कर सकें। यहां तक कि वे सब कुछ त्यागने के लिए तैयार रहते हैं, अगर उन्हें दूसरों की निंदा करने का सुख मिले। ये लोग बड़ी जल्दी हावी हो जाते हैं। उनकी विचारधारा ही उनका सबसे बड़ा हथियार हैं, क्योंकि वे निंदक बन सकते हैं। तर्कसंगत होना भी विषैले व्यक्तित्व का एक हिस्सा है। वे बड़े तर्कसंगत होते हैं। वाद-विवाद में उन्हें हराना बड़ा मुश्किल है। लेकिन वे कभी भी युक्तियुक्त नहीं होते। युक्तियुक्त और तर्कसंगत मनुष्य के बीच अंतर जानना बहुत जरूरी है। एक युक्तियुक्त मनुष्य कभी सिर्फ तर्कसंगत नहीं होता, क्योंकि एक युक्तियुक्त मनुष्य अपने अनुभव से जानता है कि तर्कसंगत और तर्कहीनता दोनों ही जीवन के दो पहलू हैं। जीवन में तर्क और भावनाएं, मस्तिष्क और हृदय दोनों होते हैं।

दूसरे प्रकार का व्यक्तित्व है एन-व्यक्तित्व, पुष्टिकर व्यक्तित्व जो बिल्कुल अलग है। उनका कोई आदर्श नहीं होता, वे जीवन को देखते हैं और वास्तविकता ही उनका आदर्श तय करती है। वह अत्यंत युक्तियुक्त होता है। वह कभी भी पराकाष्ठावादी नहीं होता। वह संपूर्णतावादी होता है। तर्कसंगत होने की बजाय वे पूर्णतावादी होते हैं और वे हमेशा चीजों में अच्छाई देखते हैं। एन-व्यक्तित्व हमेशा आशावान, उज्जवल, साहसी, निंदा में भरोसा नहीं रखने वाला होता है। अगर कोई एन-प्रकार का व्यक्तित्व संत बनता है, तो वह सच्चा संत होगा। अगर कोई टी-प्रकार का व्यक्तित्व संत बनता है तो वह छद्म संत होगा। अगर कोई एन-प्रकार का व्यक्तित्व पिता बनता है तो वह सच्चा पिता होगा। अगर कोई एन-प्रकार की स्त्री मां बनती है तो वह सच्ची मां होगी।

टी-प्रकार के मनुष्य छद्म माता-पिता होते हैं। उनका माता-पिता होना बच्चे का शोषण करने की, यातना देने, हावी होने, अधिकारी बनकर बच्चे को कुचलने की और बच्चे को कुचलकर शक्तिशाली अनुभव करने की एक चाल भर है। टी-प्रकार के लोग बहुमत में हैं, तो तुम शायद ठीक ही समझते हो कि तुम भी हर किसी की तरह यह विरासत लिए हुए हो। परंतु एक बार सजग होने के बाद यह ज्यादा परेशानी पैदा नहीं करता। तुम ‘टी’ से ‘एन’ तक आसानी से पहुंच सकते हो।

कुछ बातें याद रखने की हैं। तुम जैसे हो, उसे स्वीकार करो। मान लो तुम सुस्त महसूस करो तो इसे आलस्य का नाम मत दो। अपने मन की आवाज सुनो। अगर तुम्हें आलस्य आता है तो तुम उसके खिलाफ जाकर जीत भी कैसे सकते हो? तुम अपनी लड़ाई में भी आलसी रहोगे। फिर कौन जीतेगा? तुम बार-बार हारते जाओगे, तब तुम नाहक ही दुखी महसूस करोगे।

इसलिए यथार्थवादी बनो। अपने अंतरतम की आवाज सुनो। हर कोई अपनी गति से चलता है। कुछ लोग बहुत सक्रिय होते हैं, ऐसा होने में गलत नहीं है। अगर वे इससे अच्छा महसूस करते हैं तो यह उनके लिए अच्छा है। कोई आदर्श मत रखो कि तुम्हें यही करना है। ऐसा मत सोचो कि ऐसा करना चाहिए। ‘करना चाहिए’ न्यूरोसिस की स्थिति पैदा करता है। फिर व्यक्ति आविष्ट हो जाता है, फिर ‘करना चाहिए’ हमेशा बीच में आता है, तुम्हारी निंदा करता हुआ। फिर तुम किसी चीज का आनंद नहीं ले सकते।

तुम जो भी कर सकते हो, वह करो। अगर तुम कोई चीज नहीं कर सकते, तो उसे स्वीकार करो। यहां तुम स्वयं की तरह बनने आए हो, किसी आदर्श की तरह नहीं। धीरे-धीरे तुम देखोगे कि कैसे तुम ‘टी’ से ‘एन’ में बदल रहे हो। तुम पुष्टिकर बन जाओगे और जीवन का ज्यादा आनंद लेने लगोगे। तुम ज्यादा प्रेम करने लगोगे। ज्यादा जागरूक बन जाओगे और ज्यादा ध्यानपूर्ण हो जाओगे। इसका आनंद लो और जो अंतरतम को ठीक लगे, करो। बिना किसी आदर्श और पराकाष्ठा के। गहरी आशा के साथ जीवन को देखो। जीवन वास्तव में सुंदर है। ऐसा मत सोचो कि जब सब कुछ संपूर्ण होगा, तभी तुम उसका आनंद ले सकोगे। अगर तुम ऐसा सोचोगे तो कभी किसी चीज का आनंद नहीं उठा पाओगे।

परमात्मा भी सिर्फ एन-टाइप के लोगों के सामने आता है, वह टी-टाइप के लोगों से हमेशा छुपा रहता है। उसमें भी वे लोग कमियां निकाल देंगे। परमात्मा सिर्फ उनसे मिलता है जो न सिर्फ उससे पोषण ग्रहण कर सके, बल्कि उसे पोषण दे भी सके। तो आनंद लो, और सारी मुसीबतें खुद हल हो जाएंगी।

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