‘महा गठबंधन’ का ‘महा बिखराव’

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बीस महीने में ही बिहार का महागठबंधन महा बिखराव का शिकार हो गया। २०१५ में जदयू, राजद, व कांग्रेस के गठजोड़ से बने महागठबंधन की जब बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार बनी तो कहा गया कि यही महागठबंधन कल केन्द्र की सत्ता पर भी काबिज होगा। नीतीश की राजनीतिक आकांक्षा, लालू की जिद व कांग्रेस की नासमझी की राजनीति ने केवल बिहार में महागठबंधन का खेल ही नहीं बिगाड़ा है वरन् महागठबंधन के आगे खड़े रह पाने पर भी प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। महागठबंधन को नीतीश मानिन्द एक साफ सुथरे चहरे के नेतृत्व की जरूरत होगी जो आसानी से हासिल होते नहीं दिखती।
बिहार की राजनीति में गत माह ऐसा भूचाल आया कि २० महीने की राजद, जदयू व कांग्रेस की महागठबंधन की सरकार बिखर गई और राजद व कांग्रेस की सत्ता का सूर्यास्त भी हो गया। राजनीति के मंझे खिलाड़ी माने जाने वाले लालू प्रसाद यादव जहां नीतीश कुमार की औंधी राजनीति से चारों खाने चित्त हो गये वहीं कांग्रेस के भविष्य के खेवनहार राहुल गांधी एक बार पुन: अपनी लाल बुझक्कड़ी राजनीति के ही गवाह बने। लालू प्रसाद यादव ने सपने में भी नहीं सोचा था कि नीतीश कुमार दुबारा उसी भाजपा के सहारे अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी बनाये रखने की सोचेंगे भी जिसे छोड़कर उन्होंने २०१५ में राजद का दामन थामा था और महागठबंधन के बलबूते सत्तासीन हुये थे।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यादव यहीं चूक कर गये। वह यह भूल गये कि आज नहीं तो कल उनके उपमुख्यमंत्री बेटे तेजस्वी यादव को भ्रष्टाचार के चलते सजा भुगतनी तय है और तब उन्हें सत्ता से हटना ही होगा। ऐसे में यदि वो तेजस्वी को उपमुख्यमंत्री पद से हट जाने का निर्णय देते तो न केवल यह उनकी राजनीतिक चतुराई सिद्ध होती वरन् वह नीतीश कुमार पर बढ़त भी बना लेते। यादव यह आकंलन करने में भी चूक कर गये कि यदि २०१५ में उनकी पार्टी को सर्वाधिक ८० सीटें मिली थीं तो यह नि:संदेह जदयू से गठबंधन का परिणाम था। महागठबंधन को नीतीश कुमार की साफ सुथरी राजनीतिक छवि का पूरा फायदा मिला था।
यादव यह भी नहीं समझ सके कि नीतीश कुमार की जमापूंजी केवल उनकी साफ सुथरी राजनीतिक छवि ही है और कुमार इस छवि को बनाये रखने के लिये गठबंधन तोड़ भी सकते हैं। नीतीश कुमार गठबंधन की सरकार बनने के छ: माह बाद से ही असहज महसूस करने लगे थे। जिस तरह राजद के मंत्रीगण व समर्थक सरकार के लिये रोजाना नई-नई मुसीबतें पैदा करने लगे थे उससे कुमार को लगने लगा था कि यदि यही हालात रहे तो सरकार की न केवल बदनामी तय है वरन् उनकी क्लीन छवि पर भी धब्बा लगना तय है। यह भी कहा जा रहा है कि राजद बिहार में कुमार की शराबबंदी की घोषणा से भी सहमत नहीं था और उसे रद्द करने के काफी दबाव भी डाले गये थे पर अंतत: राजद को मन मसोसकर इस निर्णय को स्वीकार करना पड़ा था।
५ जुलाई को सीबीआई ने उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के विरूद्ध एफआईआर दर्ज की तो नीतीश कुमार ने उनसे स्थिति स्पष्ट करने को कहा। उस पर उपमुख्यमंत्री अथवा उनकी पार्टी द्वारा सफाई देने की बजाय राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव की ओर से बयान आया कि तेजस्वी अपने पद से इस्तीफा नहीं देंगे। क्योंकि उन्हें केन्द्र सरकार द्वारा जानबूझकर फंसाया जा रहा है। जब कुमार ने समझ लिया कि यादव अपने बेटे को हर हाल में सत्ता में बनाये रखना चाहते हैं तो उन्होंने अपनी नई रणनीति बनाना शुरू कर दिया। उन्होंने घोषणा कर दी कि राष्ट्रपति के चुनाव में जदयू, राजग प्रत्याशी रामनाथ कोविंद का समर्थन करेगा। इस पर लालू प्रसाद यादव तिलमिला उठे और उनसे पुनर्विचार करने को कहा। कांग्रेस ने भी इसे महागठबंधन के मूल सिद्धांतों के प्रतिकूल बताया पर कुमार ने वही किया जो उन्हें करना चाहिये था। यही नहीं वो जब भी दिल्ली गये प्रधानमंत्री से मुलाकात की जो महागठबंधन के घटकों को हमेशा खटकता रहा।
जब तेजस्वी यादव को लेकर भाजपा के हमले बढ़ने लगे तो मुख्यमंत्री ने एक बार पुन: पद छोड़ने को कहा। पर उसके बाद पूरी राजद नीतीश कुमार के विरोध में उतर आई। उन्हें ईमानदारी की राजनीति करने का ढोंगी करार दिया गया और चुनौती दी गई कि वो उपमुख्यमंत्री के रूप में तेजस्वी के भ्रष्टाचार को जनता के सामने लायें। और तो और नीतीश पर दबाव बनाने के लिये राजद ने २७ अगस्त को पटना के गांधी मैदान में भाजपा भगाओ रैली की एकतरफा घोषणा कर दी। जिसमें कांग्रेस सहित सपा, बसपा, तृणमूल कांग्रेस के प्रमुखों को भी आमंत्रित करने की बात कही गई। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि इसी बीच राजनीति का सधा खेल खेलते हुये नीतीश कुमार ने एक और दांव चला। वो दिल्ली में राहुल गांधी से मिले और तेजस्वी को लेकर चर्चा की। इसे राहुल गांधी की राजनीतिक नासमझी कही जाये अथवा लालू प्रसाद यादव का दबाव अथवा मोह कि उन्होंने कुमार को इस मुद्दे को टालने की सलाह दे डाली।
समझा जाता है चूंकि उनकी भाजपा के शीर्ष नेताओं से ‘डील’ पक्की हो चुकी थी सो उन्होंने बुधवार को महागठबंधन से हटने की घोषणा कर दी। यह उनका ऐसा सधा राजनीतिक निर्णय था जिससे सभी औंधे मुंह गिरने को बाध्य हो गये। सब कुछ तय योजना के अनुसार हुआ और गुरुवार को भाजपा (राजग) के सहयोग से वह पुन: मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि नीतीश कुमार ने अपनी सधी चाल से न केवल राजद व कांग्रेस को करारी मात दे दी है वरन् महागठबंधन के भविष्य पर भी प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया है। सभी जानते हैं कि महागठबंधन के पास नीतीश कुमार की तुलना में कोई ऐसा चेहरा नहीं है जो बेदाग होने के साथ राजनीति की गहरी समझ रखता हो।
उपरोक्त पर्यवेक्षकों का यह भी कहना है कि जिस तरह राजद के साथ कांग्रेस के कप्तान व उपकप्तान भ्रष्टाचार के लपेटे में हैं उससे महागठबंधन का राजग के सामने टिक पाना आसान नहीं होगा।
२०१९ तक क्या राजनीतिक हालात बनते हैं अभी कहा नहीं जा सकता। कहा तो यहां तक जा रहा है कि लालू प्रसाद को अपनी राजनीतिक हैसियत का पता तो २७ अगस्त की प्रस्तावित रैली से ही चल जायेगा। समझा जा रहा है कि हालात के मद्देनज कांग्रेस का कोई शीर्ष का नेता तक शामिल नहीं होगा अन्य दलों की बात तो जाने ही दीजिए।

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