शहरी एवं ग्रामीण इलाकों में स्ट्रोक की दर 1 लाख लोगों पर 686

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देहरादून।देवभूमि खबर।विश्व स्ट्रोक दिवस के मौके पर स्ट्रोक के बारे में जागरुकता बढ़ाने के प्रयास में मैक्स सुपर स्पेशलटी हाॅस्पिटल, देहरादून से डाॅ दीपक गोयल, डाॅ आनंद मोहन ठाकुर और डाॅ राहुल प्रशाद ने आज मीडिया को संबोधित किया। स्ट्रोक ऐसी स्थिति है जिसमें दिमाग को खून की आपूर्ति ठीक से नहीं हो पाती, इसके कारण दिमाग की कोशिकाएं तेज़ी से मरने लगती हैं। स्ट्रोक के दो मुख्य प्रकार हैंः इश्केमिक, जो खून का प्रवाह कम होने के कारण होता है और हेमरेजिक, जो रक्तस्राव के कारण होता है। स्ट्रोक के कारण दिमाग का प्रभावित हिस्सा काम करना बंद कर देता है।
सुभाष रोड स्थित एक होटल में आयोजित पत्रकार वार्ता में मैक्स अस्पताल के विशेषज्ञ चिकित्सकों ने कहा कि स्ट्रोक के लक्षणों में पैरालिसिस, बाजू, टांगों, चेहरे में और खासतौर पर शरीर के एक साईड में कमज़ोरी और सुन्नपन, बोलने, समझने और देखने में परेशानी, मानसिक उलझन, चलने में परेशानी, संतुलन या तालमेल नहीं बना पाना, बिना किसी कारण के अचानक सिर में दर्द और चक्कर आना आदि शामिल है। स्ट्रोक के मामले में मरीज को तुरंत इलाज मिलना बहुत ज़रूरी है ताकि
उसके दिमाग को नुकसान पहुंचने से बचाया जा सकें। उसे अपंगता से बचाया जा सकें, मरीज़ को मृत्यु से बचाया जा सके। भारत में स्ट्रोक के बहुत कम मरीज़ों को समय पर इलाज मिल पाता है, इसका कारण यह है कि लोग अक्सर समय पर इसके लक्षणों को पहचान नहीं पाते और मरीज देर से अस्पताल पहुंचता है। इसके अलावा अस्पताल में स्ट्रोक के निदान एवं इलाज के लिए आधुनिक सुविधाएं होना बहुत जरूरी है। मीडिया को संबोधित करते हुए डाॅ दीपक गोयल, एसोसिएट डायरेक्टर, न्यूरोलोजी विभाग, डप्छक् ने कहा, ‘‘स्ट्रोक किसी को भी हो सकता है। यह किसी भी उम्र, सामाजिक तबके या लिंग के व्यक्ति को प्रभावित कर सकता है। भारत में स्ट्रोक का शिकार होने वाले 12 फीसदी मरीज़ों की उम्र 40 साल से कम होती है। स्ट्रोक केे 50 फीसदी मामलों का करण मधुमेह, उच्च रक्तचाप और उच्च काॅलेस्ट्राॅल है।’’
डाॅ आनंद मोहन ठाकुर, सीनियर कन्सलटेन्ट, न्यूरोसर्जरी विभाग ने कहा, ‘‘स्ट्रोक के मामले में समय बहुत अधिक मायने रखता है। स्ट्रोक के बाद हर सैकण्ड दिमाग में 32,000 कोशिकाएं मरती हैं। ऐसे में मरीज़ को स्थायी अपंगता से बचाने के लिए तुरंत इलाज और थेरीप देनी बहुत ज़रूरी होता है।’’शुरूआती गोल्डन आॅवर में इलाज देने के लिए ज़रूरी है कि स्टाफ स्ट्रोक को तुरंत समझे और पहचाने और मरीज को तुरंत एमरजेन्सी में इलाज दिया जाए। मैक्स में पिछले 5 सालों के दौरान स्ट्रोक के 100 फीसदी एलिजिबल मरीज़ों को थ्रोम्बोलाइटिक थेरेपी दी गई है। अपनी आधुनिक प्रक्रियाओं और उपकरणों के चलते हम मरीज़ों को 60 मिनट के अंदर इलाज देने में सक्षम रहे हैं। डाॅ राहुल प्रशद, मेडिकल सुप्रीटेंडेन्ट, मैक्स हाॅस्पिटल, देहरादून ने कहा, ‘‘स्ट्रोक के मात्र 3 फीसदी मरीज़ों को ही थ्रोम्बोलाइटिक थेरेपी मिल पाती है क्योंकि वे समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाते। हमें लोगों को स्ट्रोक के बारे में जागरुक बनाने के लिए प्रयास करने होंगे ताकि मरीज़ों को स्ट्रोक के कारण होने वाली अपंगता से बचाया जा सके।’’उन्होंने अपनी बात को जारी रखते हुए कहा, ‘‘हम अपनी अस्पताल में स्ट्रोक के हर तरह के मरीज़ों का इलाज करने में सक्षम हैं। हम दवाओं और सर्जरी के द्वारा उन्हें आधुनिक इलाज मुहैया कराते हैं।’’

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