एच.एन. बहुगुणा: सत्ता की नैतिकता और धर्मनिरपेक्ष राजनीति का भार

लेखक: सुरेश नौटियाल ‘ग्रीनानंदा’ (अनुवादित)
हेमवती नंदन बहुगुणा की पुण्यतिथि पर उनके राजनीतिक जीवन को केवल सफलता और असफलता के सीमित दायरे में देखने के बजाय, उनके नैतिक और वैचारिक सफर की गहराइयों में उतरना आवश्यक हो जाता है। बहुगुणा केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के भीतर एक नैतिक बेचैनी के प्रतीक थे—सत्ता और सिद्धांत, शासन और अंतःकरण के बीच संतुलन खोजने का सतत प्रयास।
25 अप्रैल 1919 को हिमालयी क्षेत्र (वर्तमान उत्तराखंड) में जन्मे बहुगुणा के व्यक्तित्व में उस भूगोल की छाप स्पष्ट दिखाई देती है, जो संघर्ष, धैर्य और विनम्रता सिखाता है। पर्वतीय जीवन की यह संवेदना उनके राजनीतिक जीवन में भी परिलक्षित होती रही, भले ही उन्होंने दिल्ली की सत्ता के केंद्रों में लंबा समय बिताया।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ढांचे में उभरते हुए, बहुगुणा ऐसे दौर के नेता थे जब पार्टी स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत को आगे बढ़ा रही थी। इसके बावजूद, सत्ता के प्रति उनका दृष्टिकोण पूरी तरह समर्पण का नहीं था। वे उन नेताओं में रहे जिन्होंने राजनीतिक अधिकार को सार्वजनिक नैतिकता के आधार पर लगातार परखने की आवश्यकता पर बल दिया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने प्रशासनिक दक्षता के साथ-साथ शासन को सामाजिक यथार्थ से जोड़ने का प्रयास किया।
राष्ट्रीय राजनीति में बहुगुणा की पहचान उनके गहरे धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण से बनी। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता को केवल नारे के रूप में नहीं, बल्कि व्यवहारिक राजनीति के रूप में अपनाया। जब देश में सांप्रदायिक तनाव धीरे-धीरे उभर रहा था, उस समय उन्होंने विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच संवाद और सहभागिता को बढ़ावा दिया। सार्वजनिक इफ्तार जैसे आयोजनों को उन्होंने प्रतीकात्मक राजनीति नहीं, बल्कि साझा नागरिकता के विस्तार के रूप में देखा।
हालांकि, उनका राजनीतिक सफर सीधा नहीं रहा। आपातकाल के आसपास और उसके बाद कांग्रेस से उनका अलग होना वैचारिक असहजता और व्यक्तिगत आत्मसम्मान दोनों का परिणाम था। यह उस समय का बड़ा द्वंद्व था—क्या केंद्रीकृत सत्ता के भीतर रहकर समझौता किया जाए या असहमति के जोखिम के साथ हाशिए पर चला जाए। बहुगुणा ने दूसरा रास्ता चुना, जो उनके स्वतंत्र चिंतन की ताकत और उसकी सीमाओं दोनों को दर्शाता है।
उनका जीवन भारतीय राजनीति के एक स्थायी विरोधाभास को भी उजागर करता है—व्यापक राजनीतिक व्यवस्था के भीतर नैतिक स्वतंत्रता को बनाए रखना कितना कठिन है। आलोचक उनके राजनीतिक बदलावों को अवसरवाद के रूप में देखते हैं, लेकिन 1970 और 1980 के दशक की अस्थिर राजनीतिक परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जब वैचारिक स्थिरता खुद संकट में थी और अस्तित्व के लिए अनुकूलन आवश्यक हो गया था।
17 मार्च 1989 को क्लीवलैंड में हृदय सर्जरी के बाद उनके निधन के साथ एक ऐसे जीवन का अंत हुआ जिसने स्वतंत्रता-उत्तर भारत की राजनीति के उत्थान और पतन दोनों को देखा। फिर भी, उनकी विरासत चुनावी आंकड़ों या दलगत सीमाओं में सिमटती नहीं है। वह एक मूल प्रश्न छोड़ जाती है—क्या सत्ता की दौड़ में राजनीति मानवीय बनी रह सकती है?
बहुगुणा का जीवन हमें यह सिखाता है कि धर्मनिरपेक्षता केवल संवैधानिक प्रावधान नहीं, बल्कि निरंतर समावेशन की प्रक्रिया है; नेतृत्व सत्ता में बने रहने से नहीं, बल्कि असहमति जताने के साहस से परिभाषित होता है; और एक राजनेता का वास्तविक मूल्य उसकी जीत में नहीं, बल्कि उन मूल्यों में होता है जिन्हें वह छोड़ने से इंकार करता है।
आज, जब भारत अपनी लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष पहचान को नए संदर्भों में पुनर्परिभाषित कर रहा है, बहुगुणा का जीवन एक अधूरी बहस की तरह सामने आता है। यह हमें याद दिलाता है कि राजनीति का सर्वोत्तम रूप वर्चस्व नहीं, बल्कि सहअस्तित्व का अनुशासन है।

