चैत्र मास में भिटौली की परंपरा, पहाड़ की संस्कृति और भावनात्मक रिश्तों का प्रतीक
अल्मोड़ा। उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल अंचल में चैत्र मास के दौरान मनाई जाने वाली ‘भिटौली’ की परंपरा आज भी सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह परंपरा विवाहित बहनों और बेटियों के प्रति मायके के स्नेह और जुड़ाव का प्रतीक है, जिसमें उन्हें उपहार स्वरूप पकवान, वस्त्र और अन्य सामग्री भेंट की जाती है।
परंपरा के अनुसार, चैत्र माह में मायके पक्ष से विवाहित बेटियों को ‘भिटौली’ (कलेऊ) भेजा जाता है। हर वर्ष इस अवसर का महिलाओं को विशेष रूप से इंतजार रहता है। हालांकि, बदलते समय और पर्वतीय क्षेत्रों से हो रहे पलायन के कारण इस परंपरा में कुछ बदलाव देखने को मिल रहे हैं। अब कई परिवार, जो रोजगार के चलते अन्य राज्यों में रहते हैं, भिटौली के रूप में नकद राशि भेजते हैं। महिलाएं इस राशि से घर में पकवान बनाकर गांव में वितरित करती हैं।
अल्मोड़ा निवासी प्रताप सिंह नेगी के अनुसार, चैत्र माह में खेतों में काम कर रही महिलाओं के आसपास ‘घुघति’ पक्षी की मधुर आवाज उन्हें भिटौली की याद दिलाती है। इस परंपरा से जुड़ी एक लोककथा भी प्रचलित है, जिसमें एक भाई अपनी बहन को भिटौली देने दूर जंगलों के रास्ते उसके ससुराल पहुंचता है, लेकिन बहन के सोए होने पर वह उपहार वहीं रखकर लौट जाता है। जागने पर भाई को न पाकर बहन दुखी हो जाती है और कथा के अनुसार, उसके बाद वह ‘घुघति’ पक्षी के रूप में जन्म लेती है, जो हर चैत्र मास में इस परंपरा की याद दिलाती है।
भिटौली से जुड़े अनेक लोकगीत भी प्रचलित हैं, जो इस परंपरा की भावनात्मक गहराई को दर्शाते हैं। यह परंपरा आज भी उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत और पारिवारिक संबंधों की मजबूती का जीवंत उदाहरण बनी हुई है।

