लैटिन अमेरिका व भारत का इतिहास नई पीढ़ी के लिए प्रेरणादाई : प्रोफ़ेसर डंगवाल
देहरादून।दून विश्वविद्यालय के स्पेनिश विभाग द्वारा आयोजित एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
इस अवसर पर संगोष्ठी को संबोधित करते हुए विश्वविद्यालय की कुलपति डॉक्टर प्रोफेसर सुरेखा डंगवाल ने कहा कि दुनिया में कई बार ऐसे भी जुड़ाव देखने में आते हैं जब हम भौगोलिक दृष्टि से एक दूसरेे से जुड़े हुए ना होकर भी बौद्धिक रूप से एक दूसरे को अपने सन्निकट पाते हैं। लैटिन अमेरिका व भारत का विचारों की दृष्टि से पिछली कई शताब्दियों से बौद्धिक स्तर पर जुड़ाव रहा है वर्तमान समय में कोविड-19 वैश्विक महामारी के दौर में यह जुड़ाव विश्व के विभिन्न देशों व समुदायों के मध्य स्पष्ट रूप से देखा व महसूस किया जा सकता है ।
संगोष्ठी की संयोजिका डॉ माला शिखा ने कहा कि लैटिन अमेरिका तथा भारत औपनिवेशिक काल और उसके बाद के अनुभव के आधार पर सांस्कृतिक व बौद्धिक रूप से बीसवीं शताब्दी मैं काफी जुड़ा रहा है और उन अनुभवों को आगे जोड़े रखने की आवश्यकता है। इस अवसर पर डॉक्टर आश नारायण रांय निदेशक सामाजिक विज्ञान संस्थान नई दिल्ली ने कहा कि बीसवीं शताब्दी में लैटिन अमेरिका के स्वदेशी ज्ञान मीमांसा का अंतरराष्ट्रीयकरण व बुवेन विवीर के विचारों को आत्मसात कर समाज को आगे बढ़ाने की ललक स्पष्ट रूप से महसूस की जा सकती है । दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर मिनी साहनी ने लैटिन अमेरिका के कई दार्शनिकों व विद्वानों का जिक्र करते हुए सांस्कृतिक व दार्शनिक सतर पर उनके योगदान की सराहना करते हुये कहा कि भारत व लैटिन अमेरिका के दर्शन का अंतरराष्ट्रीयकरण के साथ ही इसे एक नयी पहचान के रूप में अभीवक्त करना बीसवीं शताब्दी की बड़ी उपलब्धि है ।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व आचार्य प्रोफेसर श्यामा प्रसाद गांगुली ने संयुक्त राज्य अमेरिका के अधिपत्यवाद की चुनौतियां तथा 19वीं शताब्दी में लैटिनअमेरिका देशों के साथ भारतीय विचार व विचारकों की उपस्थिति पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि लैटिन अमरीका व भारतीय विचार मिमांसा अमरीका के अधिपत्यवाद की चुनौतियों का सामना करने मे सहायक सिद्ध हुए। अर्जेंटीना की नोरदेसेट विशवविद्यालय की डॉक्टर लूसिया कैमी नाडा रोसेटी ने लैटिन अमेरिका के विद्वानों व दार्शनिकों के कार्यों का विस्तार से जिक्र करते हुए कहा कि किस प्रकार ज्ञान मीमांसा व विचारो की अभिव्यक्ति राजनैतिक व बौद्धिक दृष्टि से राष्ट्र के सांस्कृतिक विकास में सहयोगी रही।
इस अवसर पर दून विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लैंग्वेजैज की डॉक्टर तनवी नेगी, डॉ वरुण देव शर्मा, स्वाति बिष्ट, अना सिंह सहित कई विद्यार्थी व शिक्षक उपस्थित रहे।

