सच्चे अर्थों में आधुनिक भारत के निर्माता है डॉक्टर भीमराव अंबेडकर- जस्टिस श्रीवास्तव
देहरादून।दून विश्वविद्यालय में आजादी के अमृत महोत्सव के अंतर्गत 131 वीं अंबेडकर जयंती के अवसर पर उनके अविस्मरणीय कार्यों को याद करते हुए “डॉ भीमराव अंबेडकर और भारत का संविधान” विषय पर वेबीनार आयोजित किया गया।
वेबीनार को सम्बोधित करते हुए दून विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर सुरेखा डंगवाल ने कहा कि बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर भारतीय इतिहास का एक ऐसा व्यक्तित्व रहे हैं जिन्होंने रूढ़ीवादी परंपराओं पर प्रहार किया और सामाजिक न्याय की स्थापना में बहुमूल्य योगदान दिया।उनके द्वारा किए गए कार्यों को देखते हुए वह हम सभी भारतीयों के लिए ऋषि तुल्य हैं।बाबा साहब का सपना था की जब तक समाज के अंतिम छोर पर स्थित वंचित वर्ग को न्याय नहीं मिल जाता तब तक हमें निरंतर संघर्ष करना है। बाबासाहेब के द्वारा बनाए गए भारतीय संविधान के निर्माण में अविस्मरणीय योगदान जिससे देश में सर्वकल्याणकारी सरकार, मौलिक अधिकार एवं मौलिक कर्तव्य और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा आदि के कारण ही आज भारत प्रगति के पथ पर अग्रसर है। डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का सपना था कि एक राष्ट्र की एक भाषा होनी चाहिए. वह स्वयं मराठी भाषा बोलते थे लेकिन उन्होंने राष्ट्रभाषा के तौर पर हिंदी भाषा की वकालत की ।
इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री एसएन श्रीवास्तव ने अपने संबोधन में कहा कि डॉक्टर भीमराव अंबेडकर अपने माता पिता की चौदहवीं संतान थे।वह बचपन से ही प्रतिभाशाली थे। 1907 में उन्होंने मैट्रिकुलेशन की परीक्षा पास की।उन्होंने अपना स्नातक राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र जैसे विषय में पूरा किया।इसके बाद वह कोलंबिया यूनिवर्सिटी चले गए जहां पर उन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई की। भारत आने के पश्चात उन्होंने बहिष्कृत सभा नाम का एक संगठन बनाया और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए कार्य करने लगे।पूना पैक्ट में जो समझौता हुआ उससे शोषित और वंचित वर्ग के अधिकारों का संरक्षण हुआ। उनके द्वारा किए गए प्रयासों का ही फल है कि आज समाज में समरसता का भाव है।द्वितीय विश्व युद्ध में उन्होंने भारतीयों को प्रतिभाग करने के लिए प्रोत्साहित किया।डॉ भीमराव अंबेडकर संविधान सभा की ड्राफ्टिंग कमिटी के चेयरमैन रहे और उन्होंने संविधान को बनाते समय देश के विभिन्न पहलुओं पर विशेष रूप से ध्यान दिया है।उन्होंने जिस संविधान का निर्माण किया उसे नाम मात्र परिवर्तन के साथ पूर्ण सहमति के साथ स्वीकार कर लिया गया है।इससे उनके कार्य करने की क्षमता एवं अद्भुत प्रतिभा का पता चलता है. उन्होंने मंदिरों में वंचित वर्ग के लोगों के प्रवेश किए जाने का मार्ग प्रशस्त किया. डॉक्टर भीमराव अंबेडकर शुरू से ही जम्मू-कश्मीर में धारा 370 के खिलाफ थे उनका मानना था कि किसी राज्य को इस तरह का विशेष दर्जा देना अनुचित है। जब संविधान का निर्माण हो रहा था उस समय भारत के सभी क्षेत्रों से आए प्रतिनिधियों ने प्रतिभा किया लेकिन मुस्लिम नेताओं ने इस सभा में प्रतिभाग करने से मना कर दिया।बाबा साहब ने अपने जीवन में लगभग 20 पुस्तकें लिखी हैं जो कि उनकी कालजयी रचनाएं हैं।भारत के युवाओं को उन्हें अवश्य पढ़ना चाहिए। उनकी प्रमुख पुस्तकों में “पाकिस्तान और भारत का बंटवारा” एवं “शूद्र कौन हैं?” आदि हैं। न्यायमूर्ति श्री श्रीवास्तव ने बताया कि दलित शब्द मात्र 100- 200 साल पुराना है।भारतीय इतिहास में बहुत से ऐसे राजा रहे हैं जो कि कथित सवर्ण वर्ग से नहीं आते थे। पिछले 1200 सालों में भारत ने अनेक आक्रमणों का सामना किया है जिसके कारण से भारतीयों को अधिकारों से वंचित कर दिया गया था।मुस्लिम शासन काल में गैर मुस्लिमों के ऊपर जजिया कर लगाया जाता था और उन्हें जिम्मी कहा जाता था।गैर मुस्लिमों को धर्म परिवर्तन करने के लिए मजबूर किया जाता था।इस सब का वर्णन हमें बाबा साहेब की पुस्तकों में मिलता है। बाबा साहब ने संविधान में अल्पसंख्यकों की जो परिभाषा दी थी वह तार्किक थी जिसमें केवल सिख, बौद्ध और भारतीय क्रिस्चियन को वास्तविक अल्पसंख्यक माना गया था क्योंकि यह लोग पूरी जनसंख्या का 1.5% से भी कम थे।लेकिन वर्तमान में कई राज्य ऐसे हैं जहां पर हिंदू अल्पसंख्यक हैं और मुस्लिम बहुसंख्यक है लेकिन फिर भी मुस्लिम को अल्पसंख्यक के तौर पर लाभ दिया जाता है। यह विषय अभी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है. बाबा साहब ने इस बात पर जोर दिया है कि मूलभूत कर्तव्यों का भी वही मूल्य है जो मूलभूत अधिकारों का है।अंत में उन्होंने कहा कि अपने जीवन में बाबा साहब ने जो कार्य किए हैं उन्हें देखते हुए ऐसा लगता है कि वह बाल्मीकि और वेद व्यास के क्रम में ही एक महान ऋषि हैं और सच्चे अर्थों में आधुनिक भारत के राष्ट्र निर्माता है डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को कहा जा सकता है।
प्रोफेसर हर्ष डोभाल अपने वक्तव्य में कहा कि अगर प्रजातंत्र की बात की जाए तो भारतीय प्रजातंत्र अत्यधिक सशक्त है क्योंकि हिंदुस्तान के साथ ही आजाद हुए बहुत से देशों ने भी अपने देश में प्रजातंत्र को स्थापित किया लेकिन संवैधानिक रूप से कमजोर होने के कारण वहां पर प्रजातंत्र सुरक्षित नहीं रहा चाहे वह श्रीलंका हो, वर्मा हो या पाकिस्तान।भारत में आजादी के 75 सालों के बाद भी अभिव्यक्ति की आजादी है। हम अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र है और यह स्वतंत्रता हमें देता है बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के द्वारा बनाया गया संविधान।बाबासाहेब आंबेडकर एक अर्थशास्त्री भी थे और उन्होंने न केवल वंचित वर्ग के लिए काम किया बल्कि महिलाओं और कामगारों के लिए भी संघर्ष किया।
कार्यक्रम का संचालन प्रोफेसर एचसी पुरोहित के द्वारा किया गया एवं धन्यवाद प्रस्ताव दून विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ मंगल सिंह मंदरवाल ने किया।
इस कार्यक्रम में प्रोफेसर आरपी ममगईं, प्रोफेसर चेतना पोखरियाल, डॉक्टर सविता कर्नाटक, डॉ अरुण कुमार, डॉ राजेश भट्ट, डॉ नरेंद्र रावल, डॉक्टर हिमानी, डॉ राशि मिश्रा और डॉ सुधांशु जोशी आदि सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने प्रतिभाग किया।

