सूचना मांगते ही वेतन जारी, फिर अनुशासनहीनता का आरोप — क्या विभागीय कार्यप्रणाली जवाबदेही से भाग रही है?
देहरादून। महानिदेशालय मुख्यालय में तैनात एक कर्मचारी का वेतन उस समय रोक दिया गया जब अधिष्ठान अनुभाग ने उनकी फाइल को बिना कारण स्पष्ट किए लंबित रखा, जबकि संबंधित अवकाश वरिष्ठ अधिकारियों से पूर्व में अनुमोदित था।
कर्मचारी ने जब सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत नियमानुसार जानकारी मांगी और साथ ही मामले को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक पहुंचाया, तो वही फाइल जिसे महीनों तक टाल दिया गया था, तत्काल गति में लाई गई और लंबित वेतन निर्गत कर दिया गया।
हालांकि, इस प्रक्रिया के बाद कर्मचारी पर “अनुशासनहीनता” का आरोप लगाया गया। कर्मचारी का कहना है कि उन्होंने सिर्फ अपने वैधानिक और संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग किया, जिसे अनुशासनहीनता ठहराना पूर्णतः अन्यायपूर्ण है।
वहीं, एक तटस्थ कर्मचारी ने भी स्पष्ट किया कि इस दौरान किसी भी तरह की अशिष्टता या अनुशासनहीन आचरण नहीं हुआ। यह सवाल खड़ा करता है कि क्या सूचना मांगना अब विभाग में असुविधा का कारण बन गया है?
कर्मचारी ने इस पूरे प्रकरण के बाद मुख्यमंत्री व मुख्य सचिव को सुझाव भेजा है कि लिपिक संवर्ग के वरिष्ठ पदों पर पदोन्नति से पूर्व प्रशासनिक दक्षता एवं वित्तीय नियमों की परीक्षा अनिवार्य की जाए। साथ ही कहा कि यदि किसी व्यवस्था में खामी है तो उसे छिपाने के बजाय उसे सुधारा जाना चाहिए — चाहे वह स्वयं से जुड़ी हो या किसी और से।
यह मामला विभागीय कार्यप्रणाली, जवाबदेही और पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। क्या यह व्यवस्था गलतियों को स्वीकारने की बजाय उन्हें छिपाने और सवाल पूछने वालों को दबाने की कोशिश में लगी है? अब आवश्यकता है कि संस्थागत ईमानदारी और उत्तरदायित्व को प्राथमिकता दी जाए, ताकि कर्मचारियों को उनके अधिकार मांगने पर प्रताड़ना का सामना न करना पड़े।

