जड़ों के बिना घास: विकास में जनभागीदारी की कमी : देवेन्द्र कुमार बुडाकोटी
उत्तराखंड में पंचायत चुनावों के बाद विकास की उम्मीदें फिर से जागी हैं, लेकिन जमीनी हकीकत अलग कहानी कहती है। चुनावी गहमागहमी और मेले जैसे माहौल के बाद ग्राम सभाओं की बैठकों में वही लोग नदारद रहते हैं जो वोट डालने लौटे थे।

1952 के कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम से लेकर 73वें संविधान संशोधन (1992) तक, लगातार प्रयास हुए कि विकास प्रक्रिया में जनता की सहभागिता बढ़े, लेकिन यह अब भी अधूरा सपना है। 1985 में प्रकाशित अध्ययन “Grass Without Roots” ने दिखाया कि सरकारी तंत्र जनता की जरूरतों को समझने और पूरा करने में विफल रहा।

कोविड-19 महामारी और पलायन ने इस कमजोरी को और उजागर किया। सरकार ने योजनाएँ घोषित कीं, लेकिन ग्रामीण युवाओं की वास्तविक आकांक्षाओं और जीवनशैली से मेल न खाने के कारण लोग वापस शहर लौट गए।
लेखक का मानना है कि जब तक विकास योजनाओं में वास्तविक जनभागीदारी नहीं होगी और प्रतीकात्मक प्रक्रियाओं से आगे नहीं बढ़ा जाएगा, तब तक विकास की घास तो उगेगी लेकिन उसकी जड़ें कभी नहीं जमेंगी।
लेखक एक समाजशास्त्री हैं, जो पिछले चार दशकों से विकास क्षेत्र में कार्यरत हैं। वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पूर्व छात्र हैं और उनके शोध कार्य को नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर अमर्त्य सेन ने भी उद्धृत किया है।

