भू-कानून के कथित उल्लंघन और जमीन की खरीद-फरोख्त पर उठे सवाल, उच्चस्तरीय जांच की मांग

भू-कानून के कथित उल्लंघन और जमीन की खरीद-फरोख्त पर उठे सवाल, उच्चस्तरीय जांच की मांग
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देहरादून।अधिवक्ता सेवा मंच उत्तराखंड एवं पहाड़ स्वाभिमान सेना ने पत्रकार वार्ता कर उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में भूमि की खरीद-फरोख्त, भू-कानून के कथित दुरुपयोग और कृषि भूमि के भूखंडों में परिवर्तन कर बिक्री किए जाने के मामलों पर गंभीर चिंता जताई। वक्ताओं ने कहा कि यदि ऐसे मामलों की निष्पक्ष और तथ्यात्मक जांच नहीं हुई तो प्रदेश की जल, जंगल और जमीन पर बाहरी भू-माफिया एवं व्यावसायिक संस्थाओं का दबाव बढ़ सकता है।

पत्रकार वार्ता में पौड़ी गढ़वाल के एराड़ी गांव में करीब 144 नाली भूमि की खरीद का मामला प्रमुखता से उठाया गया। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि दून हैचरीज प्राइवेट लिमिटेड द्वारा भूमि खरीद के समय दस्तावेजों में कृषि प्रयोजन दर्शाया गया, जबकि बाद में भूमि को छोटे-छोटे भूखंडों में विभाजित कर बाहरी लोगों को बेचने की प्रक्रिया किए जाने की बात सामने आई है। उन्होंने भूमि खरीद से लेकर वर्तमान उपयोग तक के राजस्व अभिलेखों, रजिस्ट्री, भूमि उपयोग, अनुमतियों और भूखंडों की बिक्री की उच्चस्तरीय जांच की मांग की।

वक्ताओं ने संबंधित कंपनी के गठन, निदेशकों, शेयरहोल्डिंग, पूर्व संपत्तियों और उत्तराखंड में उसकी वास्तविक गतिविधियों की भी जांच की मांग उठाई। उनका कहना था कि वर्ष 2003 से पूर्व अस्तित्व में आई कंपनियों के माध्यम से भू-कानून की निर्धारित शर्तों को दरकिनार किए जाने की आशंका की भी जांच होनी चाहिए। इसके लिए ऐसी कंपनियों द्वारा प्रदेश में खरीदी गई भूमि का जनपदवार विशेष ऑडिट कराने की मांग की गई।

पत्रकार वार्ता में लैंसडौन और यमकेश्वर क्षेत्र में भूमि खरीद-फरोख्त, प्लॉटिंग, भूमि उपयोग परिवर्तन, रिसॉर्ट, आश्रम, वेलनेस सेंटर और पंचकर्म केंद्रों जैसी व्यावसायिक गतिविधियों की जांच की मांग की गई। वक्ताओं ने कहा कि कृषि प्रयोजन के लिए खरीदी गई भूमि पर बाद में व्यावसायिक गतिविधियां संचालित की जा रही हैं तो भूमि उपयोग, निर्माण अनुमति, नक्शा स्वीकृति, पर्यटन एवं पर्यावरण संबंधी अनुमतियों की जांच जरूरी है।

कैटल गांव में कथित पेड़ कटान के बाद आश्रम निर्माण तथा वन क्षेत्र से होकर बनाए गए मार्ग का मुद्दा भी उठाया गया। वक्ताओं ने कहा कि यदि मार्ग आरक्षित वन क्षेत्र से होकर गुजरता है तो वन विभाग की अनुमति, भूमि की स्थिति और निर्माण की वैधता की जांच होनी चाहिए।

प्राकृतिक जलस्रोतों और भूजल दोहन पर भी चिंता
वक्ताओं ने पर्वतीय क्षेत्रों में बड़े आश्रमों, होटल, रिसॉर्ट और वेलनेस सेंटरों द्वारा कथित रूप से कराई जा रही बोरिंग पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पहाड़ों में प्राकृतिक जलस्रोत बेहद संवेदनशील हैं और अनियंत्रित भूजल दोहन का सीधा असर स्थानीय ग्रामीणों के जलस्रोतों पर पड़ सकता है। ऐसे प्रतिष्ठानों की बोरिंग, जल उपयोग और संबंधित अनुमतियों का वैज्ञानिक एवं विभागीय ऑडिट कराने की मांग की गई।

धारा 154 और भू-कानून की समीक्षा की मांग
अधिवक्ता सेवा मंच एवं पहाड़ स्वाभिमान सेना ने वर्ष 2017-18 के दौरान भू-कानून में किए गए संशोधनों और विशेष रूप से धारा 154 से जुड़े प्रावधानों की पुनर्समीक्षा की मांग की। वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड की भौगोलिक, सामाजिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए भूमि खरीद और उसके उपयोग पर प्रभावी निगरानी की व्यवस्था होनी चाहिए।

उन्होंने सरकार से बाहरी कंपनियों को भूमि खरीद की अनुमति दिए जाने के बाद उसके वास्तविक उपयोग की निगरानी के लिए विशेष मॉनिटरिंग प्राधिकरण गठित करने तथा नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर संबंधित व्यक्ति, कंपनी अथवा अधिकारी के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई करने की मांग की।

वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड की जमीन केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की विरासत है। इसलिए भू-कानून का उद्देश्य स्थानीय लोगों के हितों के साथ-साथ पर्यावरण, जलस्रोतों और पर्वतीय क्षेत्रों की सामाजिक संरचना की सुरक्षा सुनिश्चित करना होना चाहिए। उन्होंने सरकार से आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित न रखकर संबंधित दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच कराने और जांच के तथ्यों को सार्वजनिक करने की मांग की।

पत्रकार वार्ता में एडवोकेट संदीप चमोली, अध्यक्ष अधिवक्ता सेवा मंच उत्तराखंड, पंकज उनियाल, अध्यक्ष पहाड़ स्वाभिमान सेना, एडवोकेट नवनीत कुकरेती, एडवोकेट हरेंद्र बेदी, सामाजिक कार्यकर्ता अनिल डोभाल, एडवोकेट विनीत मिश्रा, एडवोकेट कीर्ति वर्धन बिष्ट और एडवोकेट प्रदीप पासवान मौजूद रहे।

देवभूमि खबर

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