योगासन से बीमारियों की रोकथाम ही सबसे अच्छा इलाज है:प्रोफेसर सुरेखा डंगवाल
देहरादून।आजादी की अमृत महोत्सव के अंतर्गत दून विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का सफल आयोजन किया गया. अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की इस बार की थीम “मानवता के लिए योग” थी।इस कार्यक्रम का आयोजन अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के प्रोटोकॉल के अंतर्गत किया गया. इस प्रोटोकॉल में योग, आसन और प्राणायाम इस हिसाब से रहे गए हैं कि इन्हें कोई भी व्यक्ति चाहे वह बच्चा हो, जवान हो या बूढ़ा हो कर सकता है।
इस कार्यक्रम के अंतर्गत अपने संदेश में दून विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर सुरेखा डंगवाल ने कहा कि योग के महत्व को संपूर्ण विश्व समझने के साथ-साथ प्रशंसा करके अपना रहा है। शरीर और मन को निरोग रखने के लिए योग-आसन और प्राणायाम भारतीय जीवन शैली के अभिन्न अंग रहे हैं. जब कोई देश, विकसित होने की ओर अग्रसर होता है तो वह अपनी परंपराओं को छोड़ने लगता है और आधुनिकता के नाम पर एक ऐसी जीवन शैली को अपना लेता है जो कि उसके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक होती है। योग के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। आधुनिकता के नाम पर भारतीय जन अपनी जड़ों से कटने लगे और योग के विज्ञान से विमुख हो गए। आज से लगभग 2000 साल पहले पतंजलि जैसे अनेकों मनीषियों ने योग परंपरा में गहन शोध किया और वे जानते थे की मन का शरीर पर एवं शरीर का मन पर प्रभाव पड़ता है और साथ ही उन्होंने मस्तिष्क में उठने वाली अनेक नकारात्मक वृत्तियों (विचारों) को नियमित करने की विधियों की खोज भी की। भारतीय मनीषियों ने यह जान लिया था कि नकारात्मक मस्तिष्क अनेक शारीरिक बीमारियों का जन्मदाता है. और जब तक हम भय उत्पन्न करने वाले इन नकारात्मक विचारों को समझ नहीं लेंगे तब तक हम अनेक चिंताओं से घिरे रहेंगे जिन का परिणाम मानसिक और शारीरिक रोग होंगे। योगासन हमें शारीरिक रूप से स्वस्थ रखने के साथ-साथ मानसिक रूप से मजबूत करता है और हम मस्तिष्क के कार्यप्रणाली को समझते हुए नकारात्मक विचारों से स्वयं को अनासक्त (नान-अटैचमेंट) कर लेते हैं और स्वयं नकारात्मक वृत्तियों के दुष्प्रभावों की रोकथाम कर लेते हैं जिसका परिणाम होता है उन्नत स्वास्थ्य।
दून विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ एम एस मंदरवाल ने अपने संदेश में कहा कि योगाभ्यास हमारे सामान्य जन-जीवन का एक अभिन्न अंग होना चाहिए। हम सभी को नियमित तौर पर योगाभ्यास करना चाहिए क्योंकि इससे बहुत से शारीरिक रोगों से निजात मिलती है और मानसिक रूप से सुदृढ़ता मिलती है जिससे मन प्रसन्न रहता है। जिसके पास समय का अभाव वह सूर्यनमस्कार करके कम समय पर अनेक आसनों का लाभ कम समय में ही ले सकता है। किसी भी योगाभ्यास को करने से पहले उसकी बारीकियों को जानना आवश्यक है और बिना किसी एक्सपर्ट के निर्देश के योगाभ्यास शुरू नहीं करना चाहिए।
इस कार्यक्रम का संचालन मनोविज्ञान विभाग के डॉक्टर राजेश भट्ट के द्वारा किया गया उन्होंने अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि पतंजलि योग सूत्र, सांख्य योग और अद्वैतवाद जैसे विषयों में मनोविज्ञान का सूक्ष्म ज्ञान छिपा हुआ है जिसे विश्व पटल पर रखना अति आवश्यक है। भारतीय मनोविज्ञान की परंपरा संपूर्ण विश्व से अति प्राचीन है।जिस समय संपूर्ण विश्व अपनी मूलभूत आवश्यकताओं पर केंद्रित थे उस समय भारतीय योगी मन और मस्तिष्क की विभिन्न परतों से पैदा होने वाले मानसिक भ्रम को समझते हुए “वास्तविक स्व” यानी कि “आत्म स्वरूप” को समझने का प्रयास कर रहे थे। भारतीय योग परंपरा, प्राचीन भारत में किए गए हैं मनोवैज्ञानिक कार्यों के उत्कर्ष को इंगित करती है। वर्तमान में हम इस प्राचीन ज्ञान के बारे में अल्प समझ रखते हैं लेकिन जैसे-जैसे न्यूरोसाइंस की नई नई खोज हो रही है हमें उससे पतंजलि योग सूत्र आदि विषयों को वैज्ञानिक तरीके से समझने में सहायता मिल रही है।
इस कार्यक्रम में योग प्रशिक्षक के तौर पर श्री राम हिमालयन यूनिवर्सिटी से स्वाति शर्मा और उनकी सहयोगी आकृति नौटियाल ने प्रतिभाग किया। स्वाति शर्मा ने योगासन के विभिन्न कौशलों के बारे में कुशल प्रदर्शन किया एवं उनकी सहयोगी आकृति नौटियाल ने योगासन के बारे में सूक्ष्म जानकारी प्रदान की।
इस कार्यक्रम में दून विश्वविद्यालय के डीएसडब्ल्यू प्रोफेसर एचसी पुरोहित, डॉ नरेंद्र रावल, डॉ सुनीत नैथानी, डॉ प्रीति मिश्रा, डॉ राशि मिश्रा, डॉ श्रीधर, उप कुलसचिव श्री नरेंद्र लाल, दीपक कुमार, आयुषी पडवाल, अदिति कौशिक, एनसीसी कैडेट्स एवं अन्य छात्र एवं छात्राएं उपस्थित थे। जिन्होंने योगाभ्यास का लाभ उठाया।

