उत्तराखंड में निष्पक्ष चुनाव पर संकट: क्या लोकतंत्र सत्ता की इच्छा के सामने नतमस्तक हो गया है?

देहरादून।उत्तराखंड में हाल ही में सम्पन्न हुए नगर निकाय और त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों ने एक बार फिर राज्य निर्वाचन आयोग और भारतीय चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप लग रहे हैं कि आयोग अब कानून की नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ दल की इच्छाओं की पूर्ति में लगा है।
उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम के अनुसार यदि किसी उम्मीदवार का नाम शहरी और ग्रामीण दोनों मतदाता सूची में दर्ज है, तो उसका नामांकन स्वतः अमान्य माना जाता है। लेकिन टिहरी समेत कई जिलों में इस नियम की अनदेखी की गई। उदाहरणस्वरूप, टिहरी की पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती सोना सजवाण सहित कई उम्मीदवारों के पर्चों को नियमविरुद्ध स्वीकृत किया गया। वहीं दूसरी ओर, विपक्षी दल खासकर कांग्रेस समर्थित कई प्रत्याशियों के नामांकन बिना पर्याप्त कारणों के निरस्त कर दिए गए।
चयनात्मक निर्णय, न्याय की अनदेखी
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काशीपुर (उधमसिंहनगर): अनुसूचित जाति की उम्मीदवार श्रीमती नर्मता का नामांकन केवल इस आधार पर रद्द कर दिया गया कि उनका जाति प्रमाणपत्र मायके का है। जबकि यह नियमों के अनुरूप होता है कि विवाहिता महिलाओं के लिए मायके पक्ष का प्रमाण पत्र मान्य है।
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रुद्रप्रयाग: एक प्रत्याशी पर ₹27 लाख की बकाया राशि होने और राजस्व विभाग द्वारा वसूली प्रक्रिया शुरू किए जाने के बावजूद उनका नामांकन स्वीकार कर लिया गया। यह कहते हुए कि मामला हाईकोर्ट में लंबित है — जबकि न तो स्टे मिला है और न ही निर्णय उनके पक्ष में गया है।
ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले कई प्रत्याशियों को कानून की जटिलताओं की जानकारी नहीं होती, ऐसे में यह ज़रूरी होता है कि रिटर्निंग ऑफिसर और चुनाव अधिकारी कानूनी रूप से सक्षम और निष्पक्ष हों। लेकिन राज्य के कई जिलों में अनुभवहीन, कनिष्ठ और प्रशासनिक प्रशिक्षण से रहित अधिकारियों को चुनावी जिम्मेदारियां सौंपी गईं, जिससे सत्ता का प्रभाव नियमों पर भारी पड़ता दिखाई दिया।
प्रदेशभर से आ रही शिकायतों और उदाहरणों से यह बात उभरकर सामने आ रही है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाएं अब सत्ता के हितों की पूर्ति का माध्यम बनती जा रही हैं। लोकतंत्र के सबसे बुनियादी स्वरूप — पंचायत चुनाव — में भी सत्ता की मनमानी, दबाव और पक्षपात का बोलबाला रहा।
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जिन अधिकारियों को निष्पक्ष और ईमानदार होकर संविधान की रक्षा करनी चाहिए, वही अधिकारी अब सत्ता के प्रति निष्ठा जताने की होड़ में लगे हैं। जब शासन और प्रशासन दोनों ही सत्ता की गोद में बैठ जाएं, तो लोकतंत्र केवल एक दिखावा बनकर रह जाता है।
यह वक्त है जब सत्ताधारी भाजपा सरकार को यह याद रखना चाहिए कि चुनावी जीत लोकतांत्रिक सफलता तभी मानी जाएगी, जब उसमें जनमत की सच्ची झलक हो। सत्ता की कृपा से मिली जीत स्थायी नहीं होती, और जब जनता जागेगी, तो सबसे पहले जवाब उन्हीं से मांगेगी जिन पर लोकतंत्र की रक्षा का दायित्व था।
