काफल: उत्तराखंड का ‘जंगली फलों का राजा’, स्वाद के साथ पोषण का भी खजाना

काफल: उत्तराखंड का ‘जंगली फलों का राजा’, स्वाद के साथ पोषण का भी खजाना
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अल्मोड़ा।उत्तराखंड के पहाड़ों में पाया जाने वाला काफल फल अपने खट्टे-मीठे स्वाद और पोषक गुणों के कारण ‘जंगली फलों का राजा’ माना जाता है। काफल राज्य का राजकीय फल भी है और चैत्र से ज्येष्ठ माह तक पहाड़ी क्षेत्रों में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहता है।

यह फल उत्तराखंड के साथ-साथ हिमाचल प्रदेश, नेपाली और भूटान के हिमालयी क्षेत्रों में भी पाया जाता है। गर्मियों के मौसम में हल्के लाल, गुलाबी और बैंगनी रंग के काफल पहाड़ों की प्राकृतिक सुंदरता को और बढ़ाते हैं।
स्थानीय लोगों के लिए काफल का सीजन लगभग तीन महीने तक अतिरिक्त आय का स्रोत भी बनता है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग जंगलों से काफल तोड़कर बाजारों में बेचते हैं, जिससे उन्हें रोजगार के अवसर मिलते हैं।

पोषण की दृष्टि से काफल अत्यंत लाभकारी माना जाता है। इसमें विटामिन सी, विटामिन ए, पोटेशियम, आयरन, कैल्शियम, एंटीऑक्सीडेंट और अन्य खनिज तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। आयुर्वेदिक मान्यताओं के अनुसार इसका सेवन खांसी, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, पेट संबंधी रोगों, कान और दांत के दर्द तथा रक्तचाप जैसी समस्याओं में लाभकारी माना जाता है। इसके बीज और छाल का भी औषधीय उपयोग बताया जाता है।

अल्मोड़ा निवासी प्रताप सिंह नेगी के अनुसार काफल से जुड़ी एक प्रचलित लोककथा भी पहाड़ों में प्रसिद्ध है। कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक गरीब महिला और उसकी पुत्री काफल बेचकर जीवनयापन करते थे। एक दिन काफल के सूख जाने पर मां ने भ्रमवश बेटी को दोषी मान लिया और क्रोध में उसकी हत्या कर दी। पश्चाताप में मां ने भी अपने प्राण त्याग दिए। मान्यता है कि बाद में दोनों पक्षी के रूप में जन्मीं, जो आज भी काफल के जंगलों में “काफल पाको” और “मै नै चाखो” की आवाजों के रूप में सुनाई देती हैं।
काफल न केवल स्वाद और स्वास्थ्य का प्रतीक है, बल्कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और पारंपरिक जीवनशैली से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

देवभूमि खबर

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