गढ़वाल कुमायूं सम्पर्क मार्ग न बनना राजनीतिक संवेदनहीनता का परिचायक
गढ़वाल से कुमायूं के लिए कोई नया सम्पर्क मार्ग ना होने की पीड़ा उत्तराखंड राज्य के गठन के 21 वर्ष बीत जाने के बाद भी उत्तराखंड की जनता को सता रही है। कई दशकों तक चले उत्तराखंड आंदोलन के बाद भी जब राज्य प्राप्ति का लक्ष्य हासिल किया तो जनमानस की आकांक्षायें चरम पर थीं। रोजगार, स्वास्थ्य ,शिक्षा ,जल प्रबंधन,पर्यावरण संवर्धनतथा उद्योग स्थापित होने से उल्लेखनीय अंतर आएगा तथा उत्तराखंड देश के अग्रणी राज्यों में होगा। मैदानी क्षेत्रों में जरूर औद्योगिक इकाई लगी लेकिन अब तक ऐसा कोई कार्य नजर नहीं आता है जो नवोदित राज्य के नेतृत्व के दृष्टि,मिशन और समर्पण की बानगी हो। नए राज्य के विकास तथा जन आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए नेतृत्व के पास स्पष्ट विजन होना चाहिए तथा उस विजन को पूरा करने के लिए मिशन मोड पर कार्य करने की क्षमता व समर्पण की आवश्यकता होती है तब जाकर परिणाम प्राप्त होते हैं। दुर्भाग्य से उत्तराखंड राज्य में रूटीन परिणामो से आत्मविभोर होने वाले सत्ता धारी नेता हुए। जनता इन्हीं के मकड़जाल मेंउलझ कर रह गयी है। उत्तराखंड राज्य की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि राज्य गठन के 21 वर्ष पूरे होने के बाद भी गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्र के बीच सीधा रास्ता संपर्क मार्ग नहीं बन पाया ।
कुमाऊं क्षेत्र तथा पौड़ी जिले के लोग हरिद्वार अथवा राजधानी देहरादून आते हैं तो उन्हें उत्तर प्रदेश के क्षेत्र से होकर आना जाना पड़ता है ।उत्तराखंड राज्य होने के बावजूद भी गढ़वाल और कुमाऊं दो अलग-अलग क्षेत्रों की तरह ही बंटे दिखाई देते हैं ।एक इकाई के रूप में एकता प्रदर्शित नहीं हो पाती है ।इसका सबसे बड़ा कारण सुगम संपर्क मार्ग की अनुपलब्धता है। यदि पिथौरागढ़ वाला व्यक्ति राजधानी आता है तो उसे पूरा दिन तथा पूरी रात यात्रा करनी पड़ती है ।इसी तराह उत्तरकाशी वाले के लिये नैनीताल हाई कोर्ट जाना अपने आप में दुरूह कार्य है। यात्रा का अधिकांश हिस्सा उत्तर प्रदेश से होकर जाता है इतने हर्जे – खर्चे की यात्रा पारस्परिक लगाव को कहां बना सकती है।अब ऋषिकेश का एम्स स्वास्थ्य सुविधाओं का बड़ा केंद्र बन चुका है। सहारनपुर, बिजनौर तथा मुजफ्फरनगर के लोग इसका फायदा उठा रहे हैं। कोविड के इस कठिन दौर में एम्स तक पहुंच की जरूरत और बढ़ गई है। लेकिन कुमाऊ क्षेत्र के लोगों के लिए ऋषिकेश एम्स अर्थहीन बना हुआ है । जबकि कुमाऊ क्षेत्र के लिये ऋषिकेश के बजाय दिल्ली , लखनऊ ज्यादा सुविधा जनक है । इन दोनों क्षेत्रों से आने जाने वाले यात्रियों को यात्रा की दूरी की अधिकता होती है तथा साथ ही अधिक खर्च भी वहन करना पड़ता है। कोरोना काल मे तो और भी दुश्वारियों बढ़ गई।अन्य राज्यों से आने पर कोरोना रिपोर्ट की नेगेटिव रिपोर्ट में आने वाले खर्च तथा जांच और पूछताछ के लिए घंटों खड़े रहना अथवा वापस भेजा जाना अभिशाप से कम नहीं है ।अपने ही राज्य में आपने राज्य से आने जाने पर ऐसी परेशानी झेलते लोगों का दर्द उत्तराखंड का कोई राजनेता महसूस नहीं कर रहा है।इतनी राजनीतिक संवेदनहीनता और प्रदेशों में नही मिल सकती है। दोनों क्षेत्रों से आने जाने पर बार-बार उत्तर प्रदेश में प्रवेश करना उत्तराखंड राज्य के लिए भी परेशानी वाला है।गढ़वाल और कुमाऊं के बीच सीधा सुगम मार्ग ना होने का दर्द बरसात के दिनों में और गहरा जाता है अत्यधिक बरसात में यह रास्ता बाधित हो जाता है और वाहनों को मुजफ्फरनगर से मेरठ जिले तक घूम कर जाना पड़ता है ।यात्रियों को अधिक समय तथा ज्यादा किराया भुगतान के लिए मजबूर होना पड़ता है ।नजीबाबाद से हरिद्वार के बीच 50 किलोमीटर के बदले 300 किलोमीटर का सफर का कष्ट तथा परेशानी उत्तराखंड वासियों की नियति बन चुका है ।यही आश्वासन मिलता है कि कंडी मार्ग बनाया जाएगा और गढ़वाल और कुमाऊं के बीच दूरी 80 किलोमीटर कम हो जाएगी लेकिन 21 वर्षों से यह आश्वासन लगातार मृग मरीचिका की तरह धोखा देते आया है ।पर्यावरण मंत्रालय, एनजीटी ,सुप्रीम कोर्ट और कार्बेट प्रशासन के आदेशों की आड़ में उत्तराखंड सरकार तथा सत्ताधारी राजनेता छुप जाते हैं,और नये संपर्क मार्ग की चर्चा ही गायब हो जाती हैं ।चार धाम ऑलवेदर मार्ग बन सकता है ,तो यह सम्पर्क मार्ग या कोई अन्य सम्पर्क मार्ग क्यों नही ? लेकिन इसके लिए कुछ करने की परिकल्पना राजनेताओं के जेहन में नहीं आती है यह दृष्टिकोण और नीयत तथा समर्पण की दुखदाई कमी को सिद्ध करता है।
पारंपरिक कंडी मार्ग को विकसित करने में आ रही बाधाओं को नियति मानना हेलीकॉप्टर सुविधा भोगी सत्ताधारी नेताओं के लिए बहुत आसान है लेकिन जरूरी कार्यों हेतु आवागमन करने वालों के आसपास के ग्रामीणों के लिए अभिशाप है। गढ़वाल और कुमाऊं के बीच सुगम आवागमन उतना ही महत्वपूर्ण है जितना बॉर्डर तक पहुंचने ऑलवेदर रोड। कंडी मार्ग एक महत्वपूर्ण मार्ग है लेकिन क्या इसके अलावा कोई अन्य वैकल्पिक मार्ग की कल्पना नही हो सकती है। केंद्रीय राजमार्ग मंत्रालय ने ऋषिकेश दुगड्डा रानीखेत के बीच 273 किलोमीटर के मार्ग को सैद्धांतिक स्वीकृति प्रदान की है अगर इस मार्ग का ऑलवेदर मार्ग की तरह नये एलाइनमेंट पर सर्वे किया जाय ,कुछ सुरंगें ,नए पुल आदि बनते हैं,तो कुल दूरी में 100 किलोमीटर तक की कमी की जा सकती है। यह गढ़वाल कुमायूं के बीच सम्पर्क को अति सुगम बनाएगा।पारस्परिक सम्पर्क बढेंगे। धन ,समय तथा संसाधनों की बचत होगी ।हजारों लीटर पेट्रोल डीजल बचेगा।यह मार्ग पर्यटन के लिए भी महत्वपूर्ण होगा ,हजारों लोगों को रोजगार उपलब्ध होंगे। उत्तराखंड के विकास तथा आमजन को सुविधा देने के लिये यह नए मार्ग की परिकल्पना मील का पत्थर साबित हो सकता है। इसलिए सरकार के नुमाइंदों को कुछ हट कर सोचने तथा उसको अमल में लाने के लिये ठोस कार्य करने की जरूरत है।उत्तराखंड क्रांति दल वैकल्पिक मार्ग के शीघ्र निर्माण की मांग करता है।

