मोरल पुलिसिंग पर रोक के निर्देश सरकार की देर से आई स्वीकारोक्ति : गरिमा दसौनी
देहरादून। गरिमा मेहरा दसौनी ने धामी सरकार द्वारा तथाकथित हिंदूवादी संगठनों की मोरल पुलिसिंग पर रोक लगाने संबंधी निर्देशों को सरकार की “देर से आई स्वीकारोक्ति” करार दिया है।
कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने कहा कि सरकार का यह निर्देश इस बात की स्वीकारोक्ति है कि पिछले कई वर्षों से उत्तराखंड में कुछ संगठनों को खुली छूट और राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि यदि मोरल पुलिसिंग गलत थी, आम जनता को डराना-धमकाना गलत था और शोरूमों में घुसकर अराजकता फैलाना गलत था, तो सरकार पिछले वर्षों तक मौन क्यों रही।
उन्होंने कहा कि प्रदेश की जनता ने लगातार देखा है कि किस प्रकार कुछ संगठन कानून हाथ में लेकर सड़कों पर भय और उन्माद का माहौल बनाते रहे। उन्होंने आरोप लगाया कि कभी दुकानों में घुसकर उत्पात मचाया गया, कभी युवाओं को रोका-टोका गया और कभी सामाजिक एवं धार्मिक तनाव पैदा करने का प्रयास हुआ, जबकि सरकार मूकदर्शक बनी रही।
गरिमा दसौनी ने आरोप लगाया कि चुनाव नजदीक आते ही भाजपा सरकार की छवि पर सवाल उठने लगे हैं तथा निवेश और पर्यटन प्रभावित हो रहा है, इसलिए अब प्रशासन को कानून व्यवस्था की याद आ रही है।
उन्होंने कहा कि “सच्चाई यह है कि ये संगठन भाजपा की ‘बी टीम’ की तरह काम करते रहे और राजनीतिक एजेंडे को हवा देते रहे। चुनावी लाभ के लिए पूरे प्रदेश को धार्मिक उन्माद की प्रयोगशाला बनाने का प्रयास किया गया।”
कांग्रेस नेत्री ने कहा कि उत्तराखंड देवभूमि है, अराजकता की भूमि नहीं। यहां कानून का राज होना चाहिए, किसी संगठन विशेष का नहीं। उन्होंने कहा कि यदि सरकार वास्तव में गंभीर है तो केवल निर्देश जारी करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि कानून हाथ में लेने वालों पर सख्त कार्रवाई भी करनी होगी।

