वन अनुसंधान संस्थान में रसायन एवं जैवपूर्वेक्षण विभाग द्वारा संगोष्ठी आयोजित

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देहरादून।देवभूमि खबर। वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई) के रसायन एवं जैवपूर्वेंक्षण विभाग द्वारा एफआरआई के बोर्ड रूम में संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह सेमिनार भारतीय वानिकी एवं शिक्षा परिषद्, देहरादून द्वारा प्रारंभ की गयी। प्रगतिगामी पहलों में से एक है जिसका उद्देश्य अनुसन्धान कार्यों का अन्तरावलोकन तथा वर्तमान परिप्रेक्ष्य एवं भविष्य की जरूरतों के आलोक में अनुसन्धान की दशा एवं दिशा निर्धारित करना है।

इस संगोष्ठी मे आईआईटी रूड़की, नाइपर मोहाली, बिट्स पिलानी, एनबीआरआई, लखनऊ, सहित प्रमुख संस्थानों के विशिष्ट वैज्ञानिक, शिक्षाविद, और राज्य वन विभाग हरयाणा, और उद्योगों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए मुख्य अतिथि डॉ अरुण सिंह रावत, निदेशक, एफआरआई ने पादप संसाधनो के उपयोग के महत्व को रेखांकित किया और भारत की विशाल पादप विविधता जिसमें 14,500 पौधों की प्रजातियां शामिल हैं, का आजीविका उत्पादन और सतत उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए दोहन करने का आह्वान किया। उन्होंने आगे जोर दिया कि विगत वर्षों के अनुसंधान से उत्पन्न ज्ञान को समाज और उद्योग के उपयोग के लिए उत्पादों और सेवाओं में लाभप्रद रूप से रूपांतरित किया जाना चाहिए, जिसके लिए संस्थागत सहयोग जरुरी है। प्रो. संजय जाचक, नाइपर मोहाली ने अपने मुख्य उद्बोधन में फार्मास्युटिकल और न्यूट्रास्युटिकल उत्पादन पर केन्द्रित हर्बल ड्रग अनुसन्धान के क्षेत्र में प्रतिमान बदलाव के बारे में बात की1.इस विषय पर उन्होंने फार्मास्युटिकल और न्यूट्रास्यूटिकल उत्पादों के विकास और विपणन के लिए विभिन्न पहलुओं जैसे पारंपरिक ज्ञान का उपयोग, उपचार के बजाय रोग की रोकथाम, भारत और अन्य देशों में प्रचलित नियामक नीतियों आदि की चर्चा की। उन्होंने नाइपर द्वारा करी पत्ता, मुलेठी, चिया बीज, लेमनग्रास, इसबगोल, आदि से न्यूट्रास्यूटिकल्स के विकास की दिशा में किये गए सफल प्रयासों को साझा किया। इससे पहले, डॉ. विनीत कुमार, प्रमुख, रसायन एवं जैवपूर्वेंक्षण विभाग, एफआरआई ने प्रतिनिधियों और सभी प्रतिभागियों का स्वागत किया और सेमिनार के बारे में जानकारी दी.और प्रभाग द्वारा किए नवीन अनुसंधान के प्रमुख अंश प्रस्तुत किए। पहले तकनीकी सत्र में पांच व्याख्यान प्रस्तुत किये गए। श्री जगदीश चंदर, पीसीसीएफ और सदस्य सचिव, हरियाणा राज्य जैव विविधता बोर्ड, पंचकुला ने खाद्य और फार्मास्यूटिकल्स में प्रयोग के लिए वन फाइटोप्रोडक्ट के बारे में बात की। डॉ. डी. जी. नाइक, समन्वयक, महारष्ट् एजुकेशनल सोसाइटी, पुणे ने पादप स्रोतों के उपयोग में उभरते आयामों के बारे में जानकारी दी। डॉ. सुनील दुबे, बिट्स, पिलानी ने अपने व्याख्यान में फाइटोफार्मास्यूटिकल्स की फार्माकोकाइनेटिक्स के अध्ययन में चुनौतियों और संभावनाओं को इंगित किया. एनबीआरआई, लखनऊ की डॉ. मंजूषा श्रीवास्तव ने औद्योगिक महत्व के प्राकृतिक उत्पादों के बारे में विस्तार से चर्चा की. तदुपरांत आईआईटी, रुड़की से डॉ. देबराता सिरकार द्वारा औषधीय और सुगंधित पौधों से निर्मित हर्बल उत्पादों की गुणवत्ता का आकलन करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक सेंसर तकनीक के उपयोग के बारें में बताया गया. सत्र की अध्यक्षता एथिक्स फार्मा, रायपुर, छत्तीसगढ़ के डॉ. योगेन्द्र चैधरी ने की। जगदीश चंदर की अध्यक्षता में आहूत दूसरे तकनीकी सत्र में उद्योगों के प्रतिनिधियों द्वारा कुल तीन व्याख्यान प्रस्तुत किये गए। डॉ. योगेन्द्र चैधरी द्वारा बायोप्रोस्पेक्टिंग इनसाइट्स, रेगुलेशंस, आउटकम ’विषय पर व्याख्यान दिया गया। जेओन लाइफ साइंसेज, पांवटा साहिब, हिमाचल प्रदेश के डॉ. गिरीश कुमार गुप्ता ने फार्मास्यूटिकल्स में उपयोग हेतु बायोप्रोस्पेक्टिंग के औद्योगिक दृष्टिकोण के बारे में बात की. एम.एम. वार्ष्णेय, फ्लैक्स फूड्स लिमिटेड देहरादून द्वारा रसोई में प्रयोग किये जाने वाली जड़ी बूटियों के प्रतिउत्पादों के उपयोग की संभावनों को प्रस्तुत किया। संगोष्ठी के अंतिम सत्र के रूप में पैनल परिचर्चा का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता डॉ. डी. जी. नाइक और सह अध्यक्षता डॉ. गिरीश कुमार गुप्ता ने की। इस सत्र के दौरान अनुसन्धान व शैक्षिक संस्थाओं, राज्य वन विभाग, और उद्योगों से आये प्रतिनिधियों ने अपने विचारो और सुझाव साझा किए. सत्र के दौरान प्रतिनिधियों ने विभिन्न हितधारकों और पर्यावरण के हित में प्रभावी और उपयोगी परिणामों की आवश्यकता आधारित अनुसंधान और उत्पादन के लिए विशेषज्ञता आधारित अंतर संस्थागत और पब्लिक प्राइवेट सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया। संगोष्ठी का समापन डॉ. प्रदीप शर्मा द्वारा प्रस्तावित धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।

देवभूमि खबर

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