आशाओं ने न्यूनतम वेतन, पेंशन और नियमितीकरण की मांग को लेकर सरकार के खिलाफ खोला मोर्चा, अनिश्चितकालीन आंदोलन की चेतावनी

देहरादून। उत्तराखण्ड आशा हेल्थ वर्कर्स यूनियन (ऐक्टू) ने आशा कार्यकर्ताओं की विभिन्न मांगों को लेकर राज्य सरकार के खिलाफ आंदोलन तेज करने का ऐलान किया है। यूनियन की ओर से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को भेजे पत्र में न्यूनतम वेतन, कर्मचारी का दर्जा, नियमितीकरण, पेंशन सहित अन्य मांगों को तत्काल पूरा करने की मांग की गई है। यूनियन ने चेतावनी दी है कि यदि समयबद्ध तरीके से मांगों का समाधान नहीं किया गया तो राज्यव्यापी अनिश्चितकालीन आंदोलन शुरू किया जाएगा।
यूनियन ने बताया कि ऑल इंडिया स्कीम वर्कर्स फेडरेशन के आह्वान पर एक सितंबर 2026 से सितंबर माह के प्रत्येक मंगलवार को प्रदेशभर में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, राजकीय चिकित्सालयों और अन्य स्वास्थ्य संस्थानों में धरना-प्रदर्शन कर आशा कार्यकर्ताओं की मांगों को उठाया जाएगा। इसके बाद भी मांगों का समाधान नहीं होने पर आंदोलन को और तेज किया जाएगा।
यूनियन का आरोप है कि उत्तराखंड के स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत आशा कार्यकर्ताओं से लगातार काम लिया जा रहा है, लेकिन उन्हें न्यूनतम वेतन और कर्मचारी का दर्जा तक नहीं दिया गया है। आशाओं का कहना है कि मातृ एवं शिशु सुरक्षा से लेकर स्वास्थ्य विभाग के विभिन्न अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बावजूद उन्हें मिलने वाली राशि पर्याप्त नहीं है। यूनियन ने विधायकों के वेतन-भत्तों में लगातार बढ़ोतरी किए जाने का हवाला देते हुए आशा कार्यकर्ताओं को दैनिक मजदूर से भी कम भुगतान किए जाने को अन्यायपूर्ण बताया है।
यूनियन ने मुख्यमंत्री को वर्ष 2021 में खटीमा स्थित उनके कैंप कार्यालय में हुई वार्ता की भी याद दिलाई। पत्र के अनुसार, 31 अगस्त 2021 को आंदोलन के बाद आशाओं के प्रतिनिधिमंडल से वार्ता के दौरान आशाओं के लिए मासिक मानदेय निर्धारित करने तथा डीजी हेल्थ उत्तराखंड द्वारा तैयार प्रस्ताव के अनुरूप प्रतिमाह 11,500 रुपये मानदेय देने का वादा किया गया था। यूनियन का कहना है कि इस वादे को करीब पांच वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन अभी तक इसे लागू नहीं किया गया है।
यूनियन ने मांग की है कि वर्ष 2021 के प्रस्ताव को लागू करते हुए आशाओं को 11,500 रुपये मासिक मानदेय देने का वादा तत्काल पूरा किया जाए। इसके साथ ही आशाओं को न्यूनतम वेतन, कर्मचारी का दर्जा और सेवानिवृत्ति के बाद अनिवार्य पेंशन देने संबंधी प्रस्ताव आगामी विधानसभा सत्र में पारित कर केंद्र सरकार को भेजा जाए।
यूनियन ने यह भी मांग की है कि जब तक मासिक पेंशन की व्यवस्था नहीं होती, तब तक सेवानिवृत्ति के समय प्रत्येक आशा कार्यकर्ता को 10 लाख रुपये की एकमुश्त राशि दी जाए। विभिन्न मदों में मिलने वाली धनराशि को कई महीनों तक लंबित रखने के बजाय हर महीने भुगतान सुनिश्चित करने, प्रशिक्षण और पल्स पोलियो अभियान के दौरान प्रतिदिन 500 रुपये का भुगतान करने तथा सभी सरकारी अस्पतालों में आशाओं के साथ सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित करने के लिए तत्काल आदेश जारी करने की मांग भी की गई है।
इसके अलावा प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों के रिक्त पदों को तत्काल भरने, सभी अस्पतालों में आशा घरों का निर्माण करने, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन का बजट बढ़ाने तथा उसमें गैर सरकारी संगठनों की भूमिका समाप्त कर सभी कार्य स्वास्थ्य विभाग के माध्यम से कराने की मांग उठाई गई है। यूनियन ने आशा कार्यकर्ताओं की मनमाने तरीके से छंटनी करने की कोशिश बंद करने की भी मांग की है।
यूनियन ने कहा कि आशा कार्यकर्ता स्वास्थ्य व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी हैं और उनके श्रम एवं योगदान को देखते हुए उन्हें स्वास्थ्य विभाग का स्थायी कर्मचारी घोषित किया जाना चाहिए। साथ ही सेवानिवृत्ति के बाद एकमुश्त धनराशि और आजीवन अनिवार्य पेंशन की व्यवस्था की जानी चाहिए। यूनियन ने चेतावनी दी कि यदि विधानसभा चुनाव से पूर्व आशाओं की मांगों को समयबद्ध तरीके से पूरा नहीं किया गया तो राज्य सरकार की बेरुखी के विरोध में राज्यव्यापी अनिश्चितकालीन आंदोलन शुरू किया जाएगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी।
