सीबीआई जांच को लेकर गरिमा दसौनी का BJP पर हमला, कहा – 9 साल बाद भी NH-74 घोटाले की जांच अधर में, तो जश्न किस बात का?
देहरादून। उत्तराखंड कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने सीबीआई जांच को लेकर फैलाए जा रहे भ्रम पर हैरानी जताते हुए कहा कि सबसे पहली बात यह है कि अभी सीबीआई जांच की संस्तुति नहीं दी गई है, बल्कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी केंद्र सरकार को सिफारिश भेजेंगे और निर्णय केंद्र सरकार ही करेगी। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड वासी दूध के जले हैं और अब छाछ भी फूंक-फूंक कर पीते हैं। 2017 में तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी 15 दिन के भीतर एनएच-74 घोटाले की सीबीआई जांच की घोषणा की थी, लेकिन 9 साल बाद भी उस जांच का इंतजार हो रहा है।
गरिमा दसौनी ने कहा कि प्रदेश में अधीनस्थ सेवा चयन आयोग और लोक सेवा आयोग ही नहीं, बल्कि भाजपा भी अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है क्योंकि उनकी कथनी और करनी में जमीन-आसमान का फर्क है। मंगलवार को भाजपा ने अपने कार्यालय में मुख्यमंत्री को सीबीआई जांच की ‘हरी झंडी’ दिखाने पर सम्मान समारोह आयोजित किया था, जिसमें स्वयं मुख्यमंत्री धामी शामिल नहीं हुए। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर इसमें जश्न मनाने जैसा क्या है? यह तो साफ दर्शाता है कि प्रदेश का सरकारी और परीक्षा तंत्र पूरी तरह फेल हो चुका है।
उन्होंने कहा कि स्नातक स्तरीय यूकेएसएसएससी भर्ती परीक्षा मामले में सीबीआई जांच होना बताता है कि राज्य अपने स्तर पर पारदर्शी परीक्षा कराने में असमर्थ है। मुख्यमंत्री ने न तो हाईकोर्ट की सिटिंग जज की निगरानी में जांच की बात कही, न ही अधीनस्थ सेवा चयन आयोग अध्यक्ष गणेश मर्तोलिया को पद से हटाने का जिक्र किया, जबकि उनका पद पर बने रहना जांच को प्रभावित कर सकता है। एसआईटी और सीबीआई दोनों जांचों की बात करना भी औचित्यहीन है।
दसौनी ने कहा कि सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह रहा कि भाजपा नेताओं ने बेरोजगार युवाओं के 8 दिन लंबे आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश की। कभी उन्हें सनातन विरोधी बताया गया, तो कभी देश विरोधी नारे लगाने का आरोप लगाया गया। प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने तो युवाओं को अनपढ़ और गंवार तक कह डाला। यहां तक कि मुख्यमंत्री ने आंदोलन को सांप्रदायिक रंग देते हुए ‘नकल जिहाद’ करार दिया। उन्होंने पूछा कि इन अपमानजनक बयानों के लिए भाजपा प्रदेश के युवाओं से माफी कब मांगेगी?
गरिमा ने यह भी कहा कि भाजपा यह प्रचार कर रही है कि धामी आंदोलनरत युवाओं के बीच जाने वाले पहले मुख्यमंत्री हैं, जबकि यह तथ्यहीन है। इससे पहले कांग्रेस के मुख्यमंत्री रहे स्व. नारायण दत्त तिवारी और हरीश रावत भी आंदोलनों के बीच पहुंचकर संवाद कर चुके हैं और धरना समाप्त करवाया था।
