क्या गैलगोटियास विश्वविद्यालय की घटना ने भारतीय शिक्षा में ‘पैंडोरा का बक्सा’ खोल दिया है?

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देवेंद्र कुमार बुडाकोटी

फ़रवरी 2026 में नई दिल्ली में आयोजित कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) शिखर सम्मेलन भारत की धरती पर आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम था, जिसमें 30 देशों के 300 से अधिक प्रदर्शकों ने भाग लिया। इस सम्मेलन का उद्देश्य अत्याधुनिक तकनीकी नवाचारों को प्रदर्शित करना और वैश्विक AI पारिस्थितिकी तंत्र में भारत की बढ़ती भूमिका को सामने लाना था।

सब कुछ सामान्य रूप से चल रहा था, तभी गैलगोटियास विश्वविद्यालय से जुड़ी एक घटना ने पूरे आयोजन पर छाया डाल दी और भारत के निजी विश्वविद्यालयों से आने वाले तकनीकी दावों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया। विवाद तब शुरू हुआ जब विश्वविद्यालय पर यह आरोप लगा कि उसने चीन में निर्मित एक रोबोटिक कुत्ते को अपनी “मेड इन इंडिया” इन-हाउस नवाचार के रूप में प्रस्तुत किया। यह घटना शीघ्र ही सोशल मीडिया पर व्यापक उपहास का विषय बन गई और इसके साथ ही देश भर में निजी विश्वविद्यालयों में अकादमिक ईमानदारी तथा शिक्षण और शोध की गुणवत्ता को लेकर व्यापक बहस छिड़ गई।

गैलगोटियास विश्वविद्यालय द्वारा AI रोबोटिक कुत्ते के प्रदर्शन और उसके बाद सोशल मीडिया पर आई प्रतिक्रियाओं ने भारत में उच्च शिक्षा की स्थिति को लेकर मानो ‘पैंडोरा का बक्सा’ खोल दिया। इस घटना ने विभिन्न मीडिया मंचों पर निजी संस्थानों में उच्च शिक्षा की बुनियादी संरचना और विश्वसनीयता पर चर्चा को जन्म दिया।

यह सर्वविदित है कि भारत के अधिकांश निजी विश्वविद्यालय अपने विकास और संचालन के लिए लगभग पूरी तरह छात्रों की फीस पर निर्भर करते हैं। ऐसे तंत्र में, जहाँ आय का मुख्य स्रोत ट्यूशन फीस होती है, वित्तीय स्थिरता काफी हद तक छात्र नामांकन की संख्या पर निर्भर करती है। संस्थानों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण कई विश्वविद्यालय छात्रों को आकर्षित करने के लिए आक्रामक विपणन रणनीतियाँ अपनाते हैं।

जहाँ प्रतिष्ठित संस्थान जैसे IITs, IIMs और AIIMSs जैसे सरकारी संस्थानों—तथा कुछ स्थापित निजी विश्वविद्यालयों—को स्वयं का प्रचार करने की आवश्यकता नहीं होती, वहीं अनेक निजी विश्वविद्यालय छात्रों को अपने परिसर तक आकर्षित करने के लिए विज्ञापनों पर भारी निर्भरता रखते हैं।

सबसे आम रणनीतियों में से एक है अपने प्लेसमेंट रिकॉर्ड को प्रमुखता से दिखाना और कभी-कभी उसे बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करना। ऐसे दावों का प्रचार अक्सर समाचार पत्रों, टेलीविजन चैनलों और राजमार्गों के किनारे लगे बड़े-बड़े होर्डिंग्स में देखा जा सकता है।

इसके साथ ही भव्य भवन, आधुनिक प्रयोगशालाएँ, उन्नत बुनियादी ढाँचा और आकर्षक कैंपस सुविधाएँ इन संस्थानों के चारों ओर उत्कृष्टता का एक वातावरण निर्मित करती हैं। ऐसे देश में, जहाँ सीमित सीटों के कारण बड़ी संख्या में छात्र सरकारी शिक्षण संस्थानों में प्रवेश प्राप्त नहीं कर पाते, कई परिवारों के पास अपने बच्चों को निजी विश्वविद्यालयों में भेजने के लिए आर्थिक संसाधन जुटाने के अलावा बहुत कम विकल्प रह जाते हैं।

हालाँकि, भारत में निजी संस्थानों की शिक्षण गुणवत्ता पर प्रश्न उठाते समय यह भी आवश्यक है कि हम सरकारी शिक्षण संस्थानों—प्राथमिक विद्यालयों से लेकर उच्च विद्यालयों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों तक—की स्थिति का भी गंभीरता से मूल्यांकन करें। आज अनेक सरकारी विद्यालयों में नामांकन लगातार घट रहा है, क्योंकि अभिभावक अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में भेजना अधिक उचित समझते हैं।

इस स्थिति में एक उल्लेखनीय विडंबना भी दिखाई देती है—कई सरकारी शिक्षकों के अपने बच्चे सरकारी विद्यालयों में नहीं पढ़ते, फिर भी प्रत्येक बी.एड. (B.Ed) स्नातक सरकारी शिक्षक बनने की आकांक्षा रखता है। यह विरोधाभास शिक्षा प्रणाली के प्रति जनता के विश्वास के बारे में क्या संकेत देता है?

गैलगोटियास विश्वविद्यालय की यह घटना—जिसमें कथित रूप से चीन निर्मित AI रोबोटिक कुत्ते को स्वदेशी नवाचार के रूप में प्रस्तुत किया गया—ने व्यापक सार्वजनिक प्रतिक्रिया उत्पन्न की और शिक्षण मानकों तथा अकादमिक ईमानदारी पर राष्ट्रीय स्तर की बहस को जन्म दिया। जो मामला एक निजी संस्थान तक सीमित रह सकता था, वह अब एक बड़े सार्वजनिक मुद्दे का रूप ले चुका है। समाजशास्त्रीय दृष्टि से यह वही प्रक्रिया है जिसे समाजशास्त्रीय कल्पना-‘Sociological Imagination’ में निजी समस्या का सार्वजनिक मुद्दे में परिवर्तन कहा गया है।

जब कोई विषय सार्वजनिक मुद्दा बन जाता है, तो वह नीतिगत ध्यान की माँग करता है। ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए सुविचारित सार्वजनिक नीतिगत पहल आवश्यक है और सरकार को इस गंभीर विषय पर जिम्मेदारी और गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए।

लेखक एक समाजशास्त्री हैं और जेएनयू, नई दिल्ली के पूर्व छात्र हैं। उनके शोध कार्य का उल्लेख नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री Amartya Sen की पुस्तकों में भी किया गया है।