हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद भी नहीं हो रही कोई कार्यवाही

रुद्रपुर ।देवभूमि खबर। महानगर में सिडकुल का निर्माण होने के बाद आबादी तेजी से बढ़ी तो महानगर की तस्वीर बदसूरत होने लगी। महानगर में अतिक्रमण की जड़ें इतनी गहरी होती चली गई कि उन्हें उखाड़ पाना अब किसी के बस की बात नहीं है। रसूखदारों ने पहले ग्रीन वैल्ट पर कब्जा किया और फिर फुटपाथों पर। पहले टीन टप्पर डाल कर सरकारी जमीन को कब्जे में लिया और फिर बना दिए पक्के भवन। जिला प्रशासन ने तो पहले ही अतिक्रमण हटाने में अपने हाथ खड़े कर दिए थे, लेकिन हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी अतिक्रमण हटाने की कार्यवाही नोटिस जारी करने भर तक ही सीमित रही। हाईकोर्ट में जनहित याचिका करने वाले भी चुप हो गए, जिस कारण हाईकोर्ट के आदेश भी सरकारी फाइलों में धूल फांक रहे हैं।
सिडकुल के निर्माण से पहले महानगर चंडीगढ़ की तर्ज पर बसा दिखता था, लेकिन जैसे जैसे आबादी बढ़ी तो लोगों ने सरकारी जमीनों को कब्जाना शुरू कर दिया। देखते ही देखते ग्रीन वैल्ट व फुटपाथों पर कब्जा हो गया। राजनीतिक व निजी कारणों के चलते तत्कालीन अफसरों ने अपनी आंखें मूंदे रखी, जिस कारण महानगर में कंक्रीट के जंगल उग आए और स्थिति विकराल होती चली गई। स्थायी अतिक्रमण के बाद अब अस्थायी अतिक्रमण ने लोगों के सामने निकलने तक का संकट खड़ा कर दिया है। वर्तमान में स्थिति यह है कि ग्रीन वैल्ट व फुटपाथ पर कब्जे के बाद अब व्यापारी दुकानों के आगे सड़क पर या तो अपना माल सजा रहे हैं या फिर अपनी दुकान के आगे फड़ व ठेले लगवा रहे हैं। जिससे स्थिति और भी भयंकर हो चुकी है। अनेक बार अतिक्रमण हटाने की कवायद शुरू हुई और लाल निशान लगाए गए, मगर नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा। इस मामले में जब एक संस्था ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की तो प्रशासन ने अपना जवाब दाखिल करके लाल निशान लगाकर अतिक्रमण चिह्नित करने की बात स्वीकारी थी, लेकिन विभिन्न कारणों का हवाला देते हुए अतिक्रमण हटा पाने में हाथ खड़े कर दिए। हाईकोर्ट ने पिछले साल अतिक्रमण हटाने के स्पष्ट आदेश दिए थे, लेकिन आदेश के अनुपालन की समय सीमा तय नहीं की थी। इसी बात का लाभ प्रशासन ने फिर उठा लिया। नगर निगम ने अतिक्रमणकारियों को नोटिस तो जारी किए, मगर उसके आगे कार्रवाई नहीं बढ़ी। नतीजा यह है कि महानगर की खूबसूरती पर लगा अतिक्रमण का दाग लोगों को चिढ़ा रहा है।
नैनीताल हाइवे पर कार बाजार वालों से लेकर पीछे बैठे भू स्वामियों का पैदल चलने के लिए बनाई गई फुटपाथ पर कब्जा है। तमाम प्रशासनिक चेतावनियां इन पर बेअसर है। हाइवे पर इस तरह का अतिक्रमण शहर को बदसूरत बनाने का काम कर रहा है। वो दीगर है कि वहां से गुजरने वालों की नजर में इसके पीछे सीधे तौर पर स्थानीय सियासत के दखल से अधिक प्रशासनिक क्षमता और उनकी सूझ बूझ पर तमाम प्रश्र खड़े कर देता है। दुकानों के आगे जो फुटपाथ के अलावा खासी मात्रा में भूमि खाली छोड़ी गई है ताकि उन पर हरियाली हो सके और वहां आने जाने वाले खरीददारों की सुविधा के मद्देनजर उनके बैठने के लिए नगर निगम विकास करा सके, लेकिन विकास तब होगा जब वो जगह खाली हो। खाली कराने के लिए वोट बैंक खिसकने के चलते निगम भी अपने हाथ खींच लेता है। इसीलिए यहां का अतिक्रमण लाइलाज बीमारी बन कर रह गया है।
नैनीताल हाइवे पर अब धीरे धीरे दवाईयों, गरम कपड़ों और जूते के मोवाइल कारोबारियों का कब्जा होने लगा है। यह लोग हाइवे पर सड़क के किनारे ही अपनी मोवाइल दुकानें खोले हुए हैं। इनमें देशी और आयुर्वेदिक दवा बेचने वाले आवास विकास निवासी यशदेव बताते हैं कि वे अपनी दुकान को लगाते हैं तो उसकी नगर निगम 10 रुपये बतौर शुल्क वसूलता है। उन्होंने एक सवाल पर कहा कि उन्हें नहीं मालुम कि यह यातायात के नियमों के खिलाफ और अतिक्रमण की चपेट में आता है।
वे तो बस यहां बैठकर लोगों का देशी दवाओं से उपचार कर अपने परिवार की जीविकोपार्जन में लगे हैं। पिछले एक दशक से वे इसी तरह से अपना कारोबार करते चले आ रहे हैं। इसी तरह हाइवे पर लगे पेट्रोल पंप के किनारे खड़े जूता मोवाइल के स्वामी मेट्रोपॉलिस निवासी जुवैर मलिक का कहना है कि वो अस्थाई रू प से खड़े करते है, जिसकी निगम से रसीद कटाते हैं। उन्हें यहां जगह मिल जाती है, लिहाजा वो अपने इस चलते फिरते कारोबार से परिवार का भरण पोषण करता है।
सरकार ने भले ही रेरा कानून लागू कर दिया हो, मगर महानगर में आज भी अवैध कालोनियों का निर्माण जारी है। इन कालोनियों में सिर्फ स्टांप पर ही भूखंड बिकते हैं। मानचित्र स्वीकृत कराने के लिए किसी की जरूरत नहीं पड़ती। मनमानी का कानून यहां लागू होता है। प्रशासन चाह कर भी कुछ कर नहीं पाता। कालोनाइजरों पर नियंत्रण करने के लिए सरकार ने रेरा लागू करके भले ही शिकंजा कस दिया हो, मगर महानगर में पड़ी नजूल और सीलिंग की भूमि पर आज भी स्टांप पर ही भूखंड बिक रहे हैं। कुछ बिल्डर्स रेरा लागू होने के बाद भी निर्माण करा रहे हैं। उन्होंने अभी तक रेरा के तहत अपना पंजीकरण तक नहीं कराया है। ऐसे भी उदाहरण सामने हैं जिनमें बिल्डरों ने भूखंड बेचने का एग्रीमेंट लोगों से कर लिया है। चूंकि रजिस्ट्री पर अभी रोक है इसलिए रजिस्ट्री बाद में करा देंगे, लेकिन निर्माण बादस्तूर जारी है। प्रशासन के अधिकारियों के पास इतनी फुर्सत नहीं है कि वह अवैध रूप से चल रहे कार्यों को रुकवाएं। या फिर यूं कहें कि उनकी इसमें दिलचस्पी नहीं है।
कई को भेजे जा चुके हैं नोटिस
प्रशासन से अस्वीकार की गई ऐसी कालोनियों के माफिया हों या फिर उसमें निर्माण करने वाले, उनको एसडीएम और तहसील प्रशासन की तरफ से नोटिस भेजे गए हैं। हालांकि कई के नोटिस मिलने के बाद भी निर्माण में कहीं कोई रुकावट नहीं है। नोटिस लेने वाले मकान मालिकों से जब पूछा तो पहले तो वे बताने को तैयार नहीं हुए। फिर जब कुरेदा गया तो बोले उन्हें कोई मतलब नहीं है जिसने प्लाट दिया उसी ने निर्माण की जिम्मेदारी भी ली है।
