भारत को तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि स्वदेशी एआई उत्पादों और नवाचार का वैश्विक केंद्र बनाना होगा: प्रो. अमित सेठ
देहरादून। दून विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ टेक्नोलॉजी की ओर से शुक्रवार को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के भविष्य, नवाचार और रोजगार की संभावनाओं पर विशेष संवादात्मक सत्र आयोजित किया गया। कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल के संरक्षण में आयोजित कार्यक्रम में कंप्यूटर विज्ञान के 200 से अधिक विद्यार्थियों ने प्रतिभाग किया। मुख्य वक्ता के रूप में इंडियन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (आईएआईआरओ) के संस्थापक निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी प्रो. (डॉ.) अमित सेठ ने विद्यार्थियों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बदलते स्वरूप, अनुसंधान की नई दिशाओं और भविष्य में उभरते करियर विकल्पों की जानकारी दी।
प्रो. अमित सेठ ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब केवल कंप्यूटर विज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, प्रशासन और वैज्ञानिक अनुसंधान सहित अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण बदलाव ला रही है। उन्होंने विद्यार्थियों को तकनीक का उपयोग करने के साथ उसके पीछे के वैज्ञानिक सिद्धांतों को समझने और वास्तविक समस्याओं के समाधान विकसित करने के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने स्मॉल लैंग्वेज मॉडल और लार्ज लैंग्वेज मॉडल की विशेषताओं पर चर्चा करते हुए बताया कि तकनीकी समाधान का चयन आवश्यकता, उपलब्ध संसाधनों, लागत और अपेक्षित परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए। कई परिस्थितियों में कम संसाधनों में काम करने वाले छोटे और विशिष्ट मॉडल अधिक उपयोगी साबित हो सकते हैं। वहीं, बड़े भाषा मॉडल प्राकृतिक भाषा में संवाद, सूचना प्रसंस्करण और डिजिटल सहायकों के विकास में नई संभावनाएं पैदा कर रहे हैं।
प्रो. सेठ ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में सफलता केवल बड़े मॉडल विकसित करने तक सीमित नहीं है। वास्तविक नवाचार किसी समस्या की पहचान कर उसके लिए प्रभावी तकनीकी समाधान तैयार करने में है। उन्होंने विद्यार्थियों को तकनीक का निष्क्रिय उपयोगकर्ता बनने के बजाय नए उत्पादों और प्रणालियों के विकास में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।
आईएआईआरओ के दृष्टिकोण पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने भारत को तकनीकी उत्पादों के विकास में आत्मनिर्भर बनाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि भारत को केवल दूसरे देशों में विकसित तकनीकों के उपयोग तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपने अनुसंधान, तकनीकी क्षमताओं और नवाचार के आधार पर विश्वस्तरीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता उत्पाद विकसित करने चाहिए। उन्होंने स्वदेशी उद्यम-स्तरीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता मंच तथा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान गांधीनगर, भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद और आईबीएम जैसे संस्थानों के साथ सहयोग का भी उल्लेख किया।
इस अवसर पर कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता शिक्षा, अनुसंधान, उद्योग और समाज के भविष्य को नई दिशा दे रही है। विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी विद्यार्थियों को तकनीकी प्रशिक्षण देने के साथ उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण, आलोचनात्मक चिंतन, रचनात्मकता और नवाचार की क्षमता विकसित करना भी है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और उद्योगों के बीच सहयोग से भारत में स्वदेशी तकनीकी विकास को गति मिल सकती है।
प्रो. डंगवाल ने तकनीक के नैतिक और सामाजिक पक्षों को समझने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विकास मानव कल्याण, सामाजिक समावेशन और सतत विकास के उद्देश्यों के अनुरूप होना चाहिए। विद्यार्थियों को तकनीक को केवल रोजगार प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि अनुसंधान, उद्यमिता और सामाजिक समस्याओं के समाधान के अवसर के रूप में देखना चाहिए।
विद्यार्थियों को करियर संबंधी मार्गदर्शन देते हुए प्रो. सेठ ने ‘सीखना कैसे सीखें’ का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि तकनीक तेजी से बदल रही है, इसलिए केवल किसी एक प्रोग्रामिंग भाषा या सॉफ्टवेयर का ज्ञान पर्याप्त नहीं होगा। विद्यार्थियों को कंप्यूटर विज्ञान के मूलभूत सिद्धांतों, गणितीय समझ, तार्किक चिंतन और समस्या समाधान की क्षमता मजबूत करनी चाहिए, ताकि वे नई तकनीकों के अनुरूप स्वयं को तैयार कर सकें।
उन्होंने महान वैज्ञानिक डॉ. विक्रम साराभाई का उदाहरण देते हुए सही मार्गदर्शक की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, अनुभवी मार्गदर्शक विद्यार्थियों की जिज्ञासा को दिशा देने, अनुसंधान की संभावनाओं को समझने और बेहतर निर्णय लेने में मदद करते हैं।
प्रश्नोत्तर सत्र में विद्यार्थियों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के भविष्य, रोजगार के बदलते स्वरूप, आवश्यक तकनीकी कौशल और अनुसंधान के अवसरों से जुड़े प्रश्न पूछे। प्रो. सेठ ने विद्यार्थियों को हैकाथॉन, इंटर्नशिप, अनुसंधान परियोजनाओं और शोध प्रकाशनों में सक्रिय भागीदारी की सलाह दी। उन्होंने कहा कि कक्षा में प्राप्त सैद्धांतिक ज्ञान को व्यावहारिक परियोजनाओं के माध्यम से वास्तविक अनुभव में बदलना आवश्यक है। विद्यार्थियों को सेमेस्टर अवकाश का उपयोग तकनीकी प्रशिक्षण, इंटर्नशिप और नई तकनीकों के साथ प्रयोग करने में करना चाहिए।
कार्यक्रम के समापन पर स्कूल ऑफ टेक्नोलॉजी के डीन डॉ. नरेंद्र कुमार ने प्रो. अमित सेठ का अभिनंदन किया। कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन समन्वयक डॉ. प्रीति मिश्रा ने प्रस्तुत किया। इस अवसर पर स्कूल ऑफ फिजिकल साइंसेज के डीन डॉ. अरुण कुमार, कंप्यूटर विज्ञान विभाग के संकाय सदस्य और छात्र आयोजन समिति के सदस्य उपस्थित रहे।
कार्यक्रम ने विद्यार्थियों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में उभरते अवसरों, स्वदेशी तकनीकी विकास और अनुसंधान की संभावनाओं से परिचित कराया। विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि भविष्य में वही विद्यार्थी बेहतर योगदान दे सकेंगे, जो निरंतर सीखने, वैज्ञानिक चिंतन और मौलिक नवाचार के माध्यम से समाज की वास्तविक समस्याओं के समाधान विकसित करेंगे।


