उत्तराखंड में हरेला पर्व की तैयारियां शुरू, जानिए बोने से लेकर पूजा तक की पूरी परंपरा

उत्तराखंड में हरेला पर्व की तैयारियां शुरू, जानिए बोने से लेकर पूजा तक की पूरी परंपरा
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अल्मोड़ा – उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में हरेला पर्व सात जुलाई को बोया जाएगा और सोलह जुलाई को काटा जाएगा।गढ़वाल में हरेला को मूल संक्रांति और राई संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है।
कुमाऊं मंडल में हरेला पर्व तीन बार मनाया जाता है। चैत्र नवरात्रि और आश्विन नवरात्रि में इन तीनों हरेला पर्वों में सबसे महत्वपूर्ण हरेला सावन के महीने में होने वाला हरेला माना जाता है।

हरेला कैसे बोया जाता है
हरेला बोने की प्रक्रिया इस प्रकार है:

  • घर में कुंवारी लड़कियां या घर के बड़े बुजुर्ग इस हरेले की बुवाई करते हैं।
  • सबसे पहले मिट्टी को छाना जाता है, फिर टोकरी या गमले में उस मिट्टी की एक परत बनाई जाती है।
  • सात या नौ अनाजों का मिश्रण करके हरेला बोया जाता है।
  • टोकरी या गमले में मिट्टी की परत के बाद एक मुट्ठी अनाज डाला जाता है, फिर एक मुट्ठी मिट्टी डाली जाती है।
  • यह प्रक्रिया सात या नौ बार दोहराई जाती है, फिर पानी डाला जाता है।
  • इसके बाद हरेला को घर के कोने में साफ-सुथरा रखकर हर दिन पानी दिया जाता है।
  • नौवें दिन हरेला की पूजा अर्चना की जाती है और गुड़ाई की जाती है।
  • दसवें दिन सारे परिवार के लोग स्नान करके घर की सफाई करते हैं और बड़े बुजुर्ग इस हरेला को काटते हैं।
  • हरेला को काटकर पहले अपने कुल देवी-देवताओं के मंदिरों में चढ़ाया जाता है, फिर परिवार के बच्चों को आशीर्वाद देते हुए हरेला चढ़ाया जाता है।
  • बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र की कामना करते हुए उन्हें हरेला चढ़ाती हैं।

आशीर्वाद और शुभकामनाएं
हरेला पूजा के दौरान यह आशीर्वाद दिया जाता है:
ला हरियाव ला बगाव,
जिरया जागि रया,
यौ दिन यौ मास,
भियटनें रया।

एक कि इकास है जौ पांच कि पिच्चासी।
धरती बराबर चौकव,
आसमान बराबर ऊंच है जाया,
सियक जौ तराण,
हाथिक जौ बल।

हरेला की पौराणिक कथाएं

  • चैत्र मास के हरेला गर्मी का सूचक माना जाता है, जबकि आश्विन मास का हरेला मौसम बदलने का संकेत है।
  • सावन मास का हरेला सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह वर्षा का सूचक होता है। इस दिन पेड़ पौधे लगाने की परंपरा है और अन्य पेड़ों की कलम लगाई जाती है।
  • सावन का महीना महादेव जी का प्रिय महीना माना जाता है, और पहाड़ों में शिव-पार्वती का वास बताया जाता है।
  • कुछ जगहों पर हरेला पर्व में शिव और पार्वती की पूजा होती है, जबकि कुछ स्थानों पर इसे हर काली के नाम से भी जाना जाता है।

देवभूमि खबर

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