एआई के दौर में भविष्य के नीति-निर्माता तैयार करें विश्वविद्यालय: विशेषज्ञ

एआई के दौर में भविष्य के नीति-निर्माता तैयार करें विश्वविद्यालय: विशेषज्ञ
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देहरादून ।कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और नई तकनीकों के कारण दुनिया तेजी से बदल रही है। ऐसे समय में विश्वविद्यालयों को केवल पारंपरिक कक्षा-शिक्षण तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि ऐसे नए अर्थशास्त्रियों और नीति-निर्माताओं को तैयार करना चाहिए जो भविष्य की चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना कर सकें। यह बात उत्तराखंड के पूर्व मुख्य सचिव श्री एन. रवि शंकर ने दून विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग द्वारा शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए आयोजित स्नातक एवं स्नातकोत्तर विद्यार्थियों के अभिमुखीकरण कार्यक्रम में कही।

उन्होंने कहा कि आज अर्थशास्त्र और अन्य सामाजिक विज्ञानों का अध्ययन केवल बाजार और राष्ट्रीय आय तक सीमित नहीं है। भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए विद्यार्थियों को पाठ्यपुस्तकों से आगे बढ़कर सीखना होगा तथा इंटरडिसिप्लिनरी दृष्टिकोण अपनाना होगा। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों को ऐसा शिक्षण वातावरण विकसित करना चाहिए जो नवाचार, विभिन्न विषयों के समन्वित अध्ययन और वास्तविक जीवन की समस्याओं के समाधान पर आधारित हो।
इस कार्यक्रम में शिक्षाविदों, लोक नीति विशेषज्ञों और विश्वविद्यालय नेतृत्व की प्रेरणादायी उपस्थिति रही, जिससे विद्यार्थियों को समाज में अर्थशास्त्र की बदलती भूमिका को विभिन्न दृष्टिकोणों से समझने का अवसर मिला।

नवप्रवेशी विद्यार्थियों का स्वागत करते हुए दून विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान संकाय के अधिष्ठाता प्रो. राजेंद्र ममगाईं ने कहा कि आज की अर्थव्यवस्था कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जलवायु परिवर्तन, डिजिटल परिवर्तन, वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं और तेजी से बदलते श्रम बाजारों से प्रभावित हो रही है। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में देश को ऐसे अर्थशास्त्रियों और सामाजिक वैज्ञानिकों की आवश्यकता है जो तकनीकी रूप से दक्ष होने के साथ-साथ सामाजिक रूप से संवेदनशील, नैतिक मूल्यों से प्रेरित और प्रमाण-आधारित जननीतियाँ तैयार करने में सक्षम हों।
हाल ही में एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय से पीएचडी प्राप्त करने वाली युवा विदुषी डॉ. गार्गी डंगवाल ने अपने प्रेरणादायी शैक्षणिक सफर को विद्यार्थियों के साथ साझा किया। उन्होंने कहा कि कठिन परिश्रम, अनुशासन, शैक्षणिक उत्कृष्टता और असफलताओं से सीखने की क्षमता सफलता की कुंजी है। उन्होंने बताया कि यदि विद्यार्थी अपने लक्ष्य के प्रति केंद्रित और योजनाबद्ध रहें तो उनके लिए करियर के अनेक अवसर उपलब्ध हैं। उन्होंने कहा कि आज की जेन-ज़ी पीढ़ी डिजिटल रूप से जुड़ी हुई, वैश्विक दृष्टिकोण रखने वाली, उद्यमशील और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए उत्सुक है।

इस अवसर पर अंबेडकर चेयर प्रोफेसर प्रो. हर्ष डोभाल ने कहा कि सामाजिक विज्ञानों का अध्ययन अब केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं है। उन्होंने सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की वर्तमान आर्थिक नीतियों में निरंतर प्रासंगिकता पर बल देते हुए कहा कि आर्थिक विकास तभी सार्थक माना जाएगा जब उसका लाभ समाज के वंचित वर्गों तक पहुँचे और विभिन्न क्षेत्रों तथा सामाजिक समूहों के बीच असमानताओं को कम करने में मदद मिले।

डॉ. अंकित नगर ने विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम की रूपरेखा तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बहुविषयक शिक्षा और कौशल विकास संबंधी उद्देश्यों के अनुरूप उसकी विशेषताओं की जानकारी दी। विभाग के वरिष्ठ विद्यार्थियों ने ‘दून इकोनॉमिक फोरम’ का परिचय कराया, जिसका उद्देश्य अर्थशास्त्र को सरल, व्यावहारिक और विद्यार्थियों के लिए अधिक उपयोगी बनाना है।

कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने वक्ताओं के साथ प्रश्नोत्तर और संवाद सत्रों में उत्साहपूर्वक भाग लिया। उनके प्रश्नों से लोक नीति, सिविल सेवा, अंतरराष्ट्रीय संगठनों, विकास संस्थाओं, आर्थिक परामर्श, शोध संस्थानों, कॉरपोरेट विश्लेषण, उद्यमिता तथा उच्च शिक्षा में उपलब्ध नए करियर अवसरों के प्रति उनकी गहरी रुचि स्पष्ट दिखाई दी।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के शिक्षकों, जिनमें डॉ. राहुल सक्सेना, डॉ. गीतू शर्मा, डॉ. मनवेंद्र बर्तवाल और डॉ. राधा त्रिपाठी शामिल थे, के साथ बड़ी संख्या में अभिभावकों एवं विद्यार्थियों ने भी भाग लिया।

देवभूमि खबर

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