कांवडयात्रा की तैयारियां अंतिम चरण में

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देहरादून। इस वर्ष उत्तराखंड में 17 जुलाई से शुरू होने वाली कांवड़ यात्रा की तैयारियां अपने अंतिम चरण में हैं। इस बार 12 दिनों तक चलने वाली यह यात्रा 30 जुलाई को श्रावण कृष्ण चतुर्दशी (श्रावण शिवरात्रि) पर शिवालयों में जलाभिषेक के साथ विराम लेगी। वैसे तो कांवड़ यात्रा का मुख्य केंद्र गंगाद्वार हरिद्वार है, लेकिन द्रोणनगरी (दूनघाटी) के हरिद्वार के करीब होने से यहां भी हरिद्वार जैसा ही उल्लास रहता है। बड़ी तादाद में कांवड़ि‍ये द्रोणनगरी से होते हुए ही गंगाजल लेने गंगा के उद्गम स्थल गंगोत्री धाम व गोमुख के लिए प्रस्थान करते हैं। इसके साथ ही द्रोणनगरी में भी कई प्राचीन शिवालय विद्यमान हैं। इनमें श्री टपकेश्वर महादेव मंदिर, श्री पृथ्वीनाथ महादेव मंदिर, बाबड़ी शिव मंदिर व जंगम शिवालय का अपना विशिष्ट माहात्म्य बताया गया है। यही वजह है कि श्रावण कृष्ण चतुर्दशी को इन शिवालयों में कांवड़ यात्रियों का सैलाब उमड़ता है।
कांवड़ यात्रा कैसे शुरू हुई, इस संबंध में कई कथाएं प्रचलित हैं। इसमें प्रमुख कथा भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम से जुड़ी है। कहते हैं कि परशुराम ने भगवान शिव के नित्य पूजन के लिए बागपत के पास पुरा महादेव मंदिर की स्थापना की और सावन में गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर कांवड़ परंपरा की शुरुआत की। इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए आज भी लोग गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर पुरा महादेव का अभिषेक करते हैं। गढ़मुक्तेश्वर को ब्रजघाट के नाम से जाना जाता है।
वैसे कई अन्य कथाएं भी कांवड़ यात्रा से जुड़ी हुई हैं। एक कथा के अनुसार जब समुद्र मंथन से निकले कालकूट विष का पान करने से भगवान शिव की देह जलने लगी तो उसे शांत करने के लिए देवताओं ने विभिन्न पवित्र नदियों और सरोवरों के जल से उन्हें स्नान कराया। इसी के बाद सावन में गंगा जल से शिव का अभिषेक करने की परंपरा शुरू हुई। एक अन्य कथा में समुद्र मंथन के बाद शिव को ताप से शांति दिलाने के लिए रावण के उनका अभिषेक करने की बात कही गई है। लेकिन, ज्यादा प्रचलित कथा भगवान परशुराम की ही है। मान्यता है कि कांवड़ के माध्यम से जल की यात्रा का यह पर्व सृष्टि रूपी शिव की आराधना के लिए है।

देवभूमि खबर