सच्चे संत कभी किसी की निंदा नहीं करतेः विशद सागर महाराज

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हरिद्वार।देवभूमि खबर। मुरारी लाल जैन भवन ज्वालापुर के भव्य सभागार में सांतवे दिन प्रवचनों की मार्मिक वर्षा करते हुए दिगम्बर जैन मुनि श्री विशद सागर जी महाराज ने कहा कि सच्चे संत कभी किसी अन्य साधु की निंदा नहीं करते और न ही ईर्ष्या करते हैं, न आत्म प्रशंसा में लीन होते हैं। धर्म पुस्तकों में नहीें आचरण में होना चाहिए। एक सच्चा ज्ञरवक अबोध बालक की भांति निश्चल, निडर, सरल, मिथ्याचार से रहित होता है। उसकी बातें सभी को प्रिय लगती हैं, उसकी भक्ति सच्ची भक्ति होती है। भगवान महावीर ने कहा है कि घृणा पापी से नहीं पाप से करना चाहिए। जीव दया ही सर्वोत्तम धम्र है। संत सदैव क्ष्माशील होते हैं। भृगु़ऋषि ने जब भगवान श्रीकृष्ण के लात मारी तो तत्काल भगवान पूछने लगे कि प्रभु आपके पैर में कष्ट हुआ होगा लाओ मैं पैर दबा दूं। जिस प्रकार नदी पर्वत, वृक्ष, धरती, सूर्य चंद्रमा आकाश किसी से भेद नहीं करते। उसी प्रकार सच्चे संत प्रत्येक जीव के लिएसम्भाव रखते हैं। अहिंसा धर्म का पालन करते हैं पर कायर नहीं होते। जैन धम्र में स्पष्ट कहा गया है कि जब जल, फूल, सांप, बिच्छू अपना धर्म नहीं छोडते तो आप धर्म से विचलित क्यों होते हैं। आज का मानव चेहरे को नहीं आइने को देष दे रहा है। उसे जाना है कहां और कहां जा रहा है। यदि आप आपना भाग्य बदलना चाहते हो तो अपनी सोच विचार बदलो। हौंसला बनाए रखो, उडान परों से नहीं होंसलों से होती है। मुनीश्री 108 विशाल सागर महाराज ने कहा कि युग के कर्णधार आप ही हो, आप स्वयं को बदलो तो युग स्वयं बदल जाएगा। दूसरों को बदलने की चेष्टा मत करो, अपना जीवन अनुकरणीय बनाओ, संसार आपके पीछे चलेगा। भगवान महावीर के जन्म से पूर्व हिंसा का बोलबाला था। भगवान महावीर ने जियो और जीने दो, अहिंसा ही सबसे बडा धर्म है का सिद्धांत देकर नरबलि पर विराम लगा दिया। आर्यिका मां श्री 105 भक्ति भारती माता ने कहा कि माता पिंता पहले स्वयं संस्कारित हों उसके उपरांत ही संतान संस्कारी होगी। जिस बच्चे की उंगली पकडकर माता पिता मंदिर लाते हैं वहीं बच्चा बडा होकर माता पिंता को मंदिर ले जाएगा। कभी भी अपने माता पिंता को वृद्ध आश्रम में नहीं छोडना। क्षुल्लिका मां श्री वात्सल्य भारती माता ने कहा कि मनुष्य जन्म से नहीं कर्म से महान बनता है। आत्मा एक है शरीर का स्वरूप् समान है। प्रत्येक व्यक्ति की पूजा करने का तरीका अलग अलग हो सकता है लेकिन सबकि मंजिल एक ही है और वह है मानसिक शांति। सतीश जैन ने सफल संचालन करते हुए कारगिल शहीदों को श्रद्धांजलि दी। ब्रहमचारिणी ज्योति दीदी एवं आरती दीदी ने आचार्यश्री की मंगलदीपों से आरती की और पावन सानिध्य में अनेक महिलाओं ने भक्तिगीत की प्रस्तुति दी। इस अवसर पर इस अवसर पर बालेश जेन, सतीश जैन, निर्मल जैन, हंस जैन, संदीप जैन, पीके जैन, मनोज जैन, संतोष जैन, देवेद्र जैन, रवि जैन, गिरीश जेन, नीतेश जैन, राजीव जैन, अतुल जैन, सुधीर जैन, प्रेमचंद्र जैन, विपिन जैन, विजय जैन, अमित जैन, पवन जैन, पियूष जैन, रविन्द्र जैन, सिद्धार्थ जैन, सुशील जैन, अतुल जैन, विमल जैन, पदम जैन, अशोक जैन, देवेनद्र जैन, नवीन जैन, रामगोपाल गुप्ता, समर्थ जैन, विवके जैन, अभिषेक जैन, विनय पोद्धार, अमित जैन, ईश्वर जैन, ओंमकार जैन, अरूण जैन, वंशज जैन, राकेश जैन, धर्मेन्द्र जैन, सुरेष जैन, रजनीश जैन, नवीन जैन, राहुल जैन, राजेन्द्र जैन, अंकित जैन, ईश्वर जैन, महेश जैन विपुल जैन, रेखा जैन, सुशीला जैन, वंदना जैन, ब्रहमचारिणी ज्योति दीदी, संतोष जैन, मोना जैन, सलोनी जैन, मीरा जैन आदि उपस्थित थे।

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