उत्तराखंड को क्षेत्र-विशिष्ट चुनौतियों के समाधान के साथ बेहतर वित्तीय प्रदर्शन की आवश्यकता: प्रो. सुरेखा डंगवाल

उत्तराखंड को क्षेत्र-विशिष्ट चुनौतियों के समाधान के साथ बेहतर वित्तीय प्रदर्शन की आवश्यकता: प्रो. सुरेखा डंगवाल
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देहरादून। दून विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग द्वारा आयोजित पैनल चर्चा “राज्य वित्त: बजट 2024-25 का अध्ययन” में विशेषज्ञों ने उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्यों की वित्तीय चुनौतियों और अवसरों पर गंभीर मंथन किया।

कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में दून विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल ने राज्य बजट की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि उत्तराखंड को अपनी क्षेत्रीय चुनौतियों के अनुरूप योजनाएं बनानी होंगी। उन्होंने कहा कि निरंतर हो रहे पलायन को रोकने के लिए बजट में स्थानीय अवसरों के सृजन पर बल देना आवश्यक है। उन्होंने जेंडर बजटिंग की महत्ता पर भी जोर देते हुए कहा कि उत्तराखंड की महिलाएं आत्मनिर्भर हैं और उनमें नेतृत्व की जबरदस्त क्षमता है, जिसे समावेशी विकास के लिए वित्तीय योजना के माध्यम से बेहतर रूप से उपयोग में लाया जा सकता है।

विभागाध्यक्ष प्रो. आर. पी. ममगाईं ने सार्वजनिक वित्त प्रबंधन की चुनौतियों और जीएसटी व्यवस्था में उत्पादन आधारित राज्यों को हो रहे नुकसान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि उपभोग आधारित राज्यों को राजस्व का लाभ अधिक मिल रहा है, जबकि पर्वतीय और सीमांत राज्य पीछे रह जाते हैं। उन्होंने सब्सिडी की समीक्षा और उसके तर्कसंगत उपयोग की आवश्यकता पर भी बल दिया।

भारतीय रिज़र्व बैंक की निदेशक डॉ. अत्रि मुखर्जी और उनकी टीम ने “राज्य वित्त: बजट 2024-25 का अध्ययन” रिपोर्ट के निष्कर्ष साझा किए। उन्होंने बताया कि कोविड-19 के बाद विभिन्न राज्यों में कर संग्रहण की दक्षता में सुधार हुआ है। स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक कल्याण जैसे सामाजिक क्षेत्रों में व्यय में वृद्धि देखी गई है, जबकि पेंशन और ब्याज भुगतान जैसी बाध्य व्यय स्थिर रही हैं। राजस्व व्यय और पूंजीगत व्यय का अनुपात (RECO ratio) 2021-22 में 6.3 से घटकर 2024-25 में 5.2 हो गया है, जो विकासोन्मुखी खर्च की ओर संकेत करता है। उत्तराखंड की वित्तीय स्थिति में सुधार हुआ है, जहाँ ऋण-राज्य जीएसडीपी अनुपात घटकर 24.8 प्रतिशत हुआ है, हालांकि यह अभी भी 20 प्रतिशत की आदर्श सीमा से अधिक है। पेंशन, छात्रवृत्ति और अन्य योजनाओं में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) की बढ़ती भूमिका से रिसाव में कमी आई है। टीम ने राज्य से नियमित फिस्कल रिस्क असेसमेंट और ‘क्लाइमेट बजट’ तैयार करने की सिफारिश की।

पूर्व मुख्य सचिव श्री इन्दु कुमार पांडे ने राज्य बजट की जमीनी पेचीदगियों को रेखांकित करते हुए कहा कि पिछले वर्षों के व्यय रुझानों के आधार पर बजट तैयार किया जाना चाहिए। उन्होंने सामाजिक ऑडिट, संस्थागत योजना, पारदर्शी निगरानी, और वन नीति के सुधार जैसे उपायों को सार्वजनिक व्यय की दक्षता के लिए आवश्यक बताया। पर्यटन को आय और रोजगार का प्रमुख स्रोत मानते हुए उन्होंने इसकी वहन क्षमता के अनुसार नियमन और पर्यावरणीय सेवाओं पर यूज़र चार्ज लगाने की सलाह दी।

कार्यक्रम के अंत में प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित हुआ, जिसने छात्रों और विशेषज्ञों के बीच सार्थक संवाद को जन्म दिया। धन्यवाद ज्ञापन विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के ‘कुटागारशाला’ छात्र दल द्वारा प्रस्तुत किया गया।

इस अवसर पर प्रो. एच. सी. पुरोहित, डीन, स्कूल ऑफ मैनेजमेंट, प्रो. हर्ष डोभाल, प्रो. डी. डी. चौनियाल, डॉ. राजेश भट्ट, डॉ. के. आर. नौटियाल, डॉ. व्यास मिश्रा सहित कई संकाय सदस्य और छात्र उपस्थित रहे।

देवभूमि खबर

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