भ्रष्टाचार सिर्फ व्यवस्था की देन नहीं, नागरिकों की भूमिका भी उतनी ही जिम्मेदार— समाजशास्त्री डी.के. बुडाकोटी ने जताई चिंता
देहरादून।भारत में “बहुत भ्रष्टाचार है” — यह वाक्य अब आम बोलचाल का हिस्सा बन चुका है। अक्सर यह आरोप सरकारी व्यवस्था, राजनेताओं, और अधिकारियों की ओर निर्देशित होता है, चाहे वे उच्च पदों पर आसीन हों या प्रशासन के ज़मीनी स्तर पर काम कर रहे हों। सार्वजनिक चर्चाओं में नेताओं की नीयत, अफसरों की निष्क्रियता, और हालिया वर्षों में न्यायपालिका की निष्पक्षता तक पर सवाल उठाए जाते रहे हैं।
लेकिन समाजशास्त्री डी.के. बुडाकोटी के अनुसार, इस बहस में एक महत्वपूर्ण पक्ष लगातार छूटता रहा है — आम नागरिकों की भूमिका। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार को केवल राज्य और शासन-व्यवस्था की विफलता मानना अधूरी समझ है। जब तक हम खुद यह स्वीकार नहीं करते कि आम लोगों का आचरण, निर्णय, और रोज़मर्रा की नैतिकता भी इस व्यवस्था को पोषित करती है, तब तक आलोचना का कोई वास्तविक मूल्य नहीं रह जाता।
बुडाकोटी मानते हैं कि ट्रैफिक चालान से बचने के लिए रिश्वत देना, बिना लाइन में लगे काम करवाना, झूठे प्रमाणपत्रों का सहारा लेना — ये सब व्यवहार नागरिक स्तर पर उस भ्रष्ट तानेबाने का हिस्सा हैं, जिसकी आलोचना हम ऊपर के स्तर पर करते हैं।
उन्होंने चेताया कि जब तक समाज अपने भीतर के समझौतों और अनैतिकताओं का सामना नहीं करेगा, तब तक किसी भी प्रकार का सिस्टम पूरी तरह स्वच्छ नहीं हो सकता। इसीलिए ज़रूरत है आत्ममंथन की — केवल सरकार को नहीं, हमें खुद को भी कटघरे में खड़ा करने की।


