HTML tutorial
HTML tutorial

200 करोड़ के सीएसआर फंड में हेराफेरी का आरोप, ईडी की 8 ठिकानों पर छापेमारी

200 करोड़ के सीएसआर फंड में हेराफेरी का आरोप, ईडी की 8 ठिकानों पर छापेमारी
Spread the love

मुंबई। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), मुंबई क्षेत्रीय कार्यालय-1 ने धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए), 2002 के तहत 01 अक्टूबर 2026 को महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, गुजरात और दिल्ली-एनसीआर में आठ ठिकानों पर तलाशी अभियान चलाया। यह कार्रवाई धर्मेंद्र कुमार चंद्रदेव सिंह और अन्य से जुड़े कथित फर्जी कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) दान रैकेट के मामले में की गई। तलाशी के दौरान करीब 21 लाख रुपये की नकदी, आपत्तिजनक दस्तावेज और डिजिटल उपकरण जब्त किए गए।

ईडी ने जुहू थाने में दर्ज प्राथमिकी के आधार पर पीएमएलए के तहत जांच शुरू की थी। प्राथमिकी में महाराष्ट्र मेडिकल प्रैक्टिशनर्स अधिनियम, 1961, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019 और भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत विभिन्न आरोप लगाए गए हैं। इनमें भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 471 और 475 के समकक्ष अपराध भी शामिल हैं, जो पीएमएलए की अनुसूची में शामिल हैं।

जांच में सामने आया कि धर्मेंद्र कुमार चंद्रदेव सिंह के पास कोई मान्यता प्राप्त चिकित्सा योग्यता या मेडिकल काउंसिल में पंजीकरण नहीं था और उनकी शिक्षा कक्षा 12 तक हुई थी। इसके बावजूद उन्होंने कथित रूप से स्वयं को चिकित्सक के रूप में प्रस्तुत किया और करीब तीन दशकों तक अपने नाम के साथ ‘डॉक्टर’ शब्द का इस्तेमाल किया। इसी पहचान और चिकित्सक की प्रतिष्ठा का लाभ उठाते हुए उन्होंने कई धर्मार्थ न्यास और संस्थाएं स्थापित कीं, जिन्हें स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी सीएसआर गतिविधियों के लिए संचालित किया गया।

ईडी की तलाशी में प्रथम दृष्टया धर्मार्थ न्यासों, न्यासियों, सीएसआर एजेंटों, बिचौलियों और चिकित्सा उपकरण आपूर्तिकर्ताओं का एक नेटवर्क सामने आया है। जांच के अनुसार देशभर की कम से कम 40 सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने आरोपी से जुड़े न्यासों को सीएसआर के तहत धनराशि प्रदान की।

जांच में यह भी सामने आया कि कई परियोजनाएं प्राप्त धनराशि के अनुपात में या तो आंशिक रूप से पूरी की गईं अथवा उन्हें पूरा ही नहीं किया गया। वहीं, आपूर्तिकर्ताओं के बिल कथित रूप से बढ़ा-चढ़ाकर तैयार किए गए और अतिरिक्त धनराशि को फर्जी अथवा मुखौटा कंपनियों के माध्यम से आगे भेजा गया। सीएसआर राशि उपलब्ध कराने में मदद करने वाले बिचौलियों को कथित तौर पर कमीशन और अवैध भुगतान भी किया गया।

जांच के अनुसार इन न्यासों को अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों के लिए महंगे चिकित्सा उपकरण खरीदने के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने वाले माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया गया था। जब संबंधित संस्थानों ने उपकरण खरीदने के लिए धन की कमी बताई, तो उन्हें क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों से जोड़ा गया। इसके बाद जनप्रतिनिधियों द्वारा कथित रूप से उन्हीं न्यासों के माध्यम से परियोजनाओं के लिए धन उपलब्ध कराने की सिफारिश की गई। पूछताछ में सामने आया कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ने मुख्य रूप से जनप्रतिनिधियों अथवा उनके कर्मचारियों की ऐसी सिफारिशों के आधार पर न्यासों को सीएसआर राशि प्रदान की।

ईडी के अनुसार निजी कंपनियों से प्राप्त सीएसआर राशि का एक बड़ा हिस्सा मामूली कमीशन काटकर संबंधित योगदानकर्ताओं को नकद वापस किए जाने की भी जानकारी सामने आई है। तलाशी में सीएसआर एजेंटों और बिचौलियों का ऐसा नेटवर्क भी सामने आया, जिसके माध्यम से सीएसआर राशि न्यासों तक पहुंचाई जाती थी और बाद में उसे बाजार संचालकों द्वारा नियंत्रित मुखौटा कंपनियों के माध्यम से घुमाया जाता था। इनमें से कई कंपनियां विभिन्न जीएसटी धोखाधड़ी जांच में भी चिह्नित की जा चुकी हैं।

ईडी के अनुसार इस पूरे तंत्र के माध्यम से करीब 200 करोड़ रुपये की सीएसआर राशि का लेनदेन किया गया। जांच एजेंसी को प्रथम दृष्टया आशंका है कि सीएसआर व्यवस्था का इस्तेमाल लेखाबद्ध धनराशि को अघोषित नकदी में बदलने के माध्यम के रूप में किया गया। मामले में आगे की जांच जारी है।

देवभूमि खबर

Related articles