राजकीय महाविद्यालय में मनाया गया गढ़भोज दिवस, प्रतियोगिताओं में विद्यार्थियों ने दिखाई प्रतिभा

थट्यूड। राजकीय महाविद्यालय में उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति, पारंपरिक खानपान और पहाड़ी विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से गढ़भोज दिवस उत्साहपूर्वक मनाया गया। इस अवसर पर पोस्टर, भाषण और निबंध प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया, जिसमें छात्र-छात्राओं ने उत्साह के साथ प्रतिभाग कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। प्रतियोगिताओं के माध्यम से विद्यार्थियों ने उत्तराखंड के पारंपरिक व्यंजनों, स्थानीय अनाजों और पौष्टिक आहार के महत्व को रचनात्मक एवं प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम में महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. आदित्य कुमार मौर्य ने कहा कि गढ़भोज उत्तराखंड की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक ज्ञान का महत्वपूर्ण प्रतीक है। स्थानीय अनाजों एवं पहाड़ी व्यंजनों का संरक्षण केवल खानपान की परंपरा को जीवित रखना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों, कृषि परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को सहेजना भी है। इस प्रकार के आयोजन विद्यार्थियों में अपनी लोकसंस्कृति के प्रति गौरव और जिम्मेदारी की भावना विकसित करते हैं।
कार्यक्रम की संयोजक एवं मंच संचालक डॉ. भारती नौटियाल तथा उनकी सहयोगी डॉ. संगीता खड़वाल ने गढ़भोज दिवस की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए पारंपरिक पहाड़ी खाद्य पदार्थों को जन-जन तक पहुंचाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि मंडुवा, झंगोरा, गहत और भट्ट जैसे स्थानीय अनाज पौष्टिकता के साथ-साथ उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान और स्थानीय आजीविका से भी जुड़े हैं। नई पीढ़ी को इन पारंपरिक खाद्य पदार्थों से जोड़ना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
प्रतियोगिताओं में विद्यार्थियों ने अपनी रचनात्मकता, विचारों और अभिव्यक्ति कौशल का प्रदर्शन किया। निबंध प्रतियोगिता में नंदिनी ने प्रथम स्थान प्राप्त किया। पोस्टर प्रतियोगिता में अंजलि असवाल ने अपनी रचनात्मक प्रस्तुति से बाजी मारी, जबकि भाषण प्रतियोगिता में आकृति ने प्रथम स्थान हासिल किया। विजेताओं की उपलब्धि की सराहना करते हुए उनके प्रयासों को प्रोत्साहित किया गया।
इस अवसर पर महाविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. चंदा थपलियाल, डॉ. कनुप्रिया, डॉ. अखिल गुप्ता, डॉ. रवि चंद्र, डॉ. अंचला नौटियाल, डॉ. संगीता खड़वाल और डॉ. नीरज असवाल उपस्थित रहे। सभी ने ऐसे शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक आयोजनों को विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास और स्थानीय विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण बताया।
कार्यक्रम का समापन उत्तराखंड की पारंपरिक खाद्य संस्कृति को संरक्षित करने, स्थानीय उत्पादों को प्रोत्साहन देने और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने के संदेश के साथ हुआ। गढ़भोज दिवस ने विद्यार्थियों को यह समझने का अवसर दिया कि स्थानीय भोजन केवल स्वाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की पहचान, परंपरा, प्रकृति और गौरवशाली विरासत का अभिन्न हिस्सा है।


