पिथौरागढ़ के धारचूला क्षेत्र में लगेगा उच्च किस्म का ‘वन चूक’ (सीबकथोर्न), किसानों को मिला हिमाचल में विशेष प्रशिक्षण

पिथौरागढ़ के धारचूला क्षेत्र में लगेगा उच्च किस्म का ‘वन चूक’ (सीबकथोर्न), किसानों को मिला हिमाचल में विशेष प्रशिक्षण
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पिथौरागढ़। जनपद पिथौरागढ़ के धारचूला विकासखण्ड की उच्च शिखरीय वन पंचायतों में अब उच्च किस्म के वन चूक (सीबकथोर्न) के पौधों का रोपण किया जाएगा। प्रभागीय वनाधिकारी पिथौरागढ़, श्री आशुतोष सिंह ने बताया कि वन विभाग के सहयोग से हिमालयी क्षेत्रों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण 5000 सीबकथोर्न के पौधे हिमाचल प्रदेश से लाए गए हैं, जिन्हें विभिन्न वन पंचायतों में रोपा जाएगा।

दिनांक 21 से 27 अप्रैल 2025 तक धारचूला क्षेत्र के 14 कृषकों और वन विभाग के कर्मचारियों को हिमाचल प्रदेश के प्रतिष्ठित संस्थानों में सीबकथोर्न के संरक्षण, कृषिकरण और मूल्य संवर्धन पर प्रशिक्षण दिलाया गया। गोविन्द बल्लभ पन्त राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान, मौहाल कुल्लू में प्रभारी इंजीनियर श्री आर.के. सिंह तथा वैज्ञानिक सरला जी द्वारा किसानों को सीबकथोर्न की उपयोगिता और आजीविका संवर्धन पर विस्तार से जानकारी दी गई।

हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय की शाखा कुकुमरोरी (उदयपुर) में पौधशाला स्थापना का प्रशिक्षण प्रदान किया गया। क्यालांग स्थित केसी संस्था और जालमा में मां हिडिम्बा स्वयं सहायता समूह द्वारा मूल्य संवर्धन उपकरणों का प्रदर्शन कर किसानों को विपणन की जानकारी दी गई। प्रगतिशील कृषक श्री अमर सिंह ठाकुर के सीबकथोर्न बाग का भ्रमण भी दल ने किया, जहां से उच्च गुणवत्ता वाले 5000 पौधे (ड्रिल्यू किस्म) प्राप्त किए गए।

प्रशिक्षण दल में वालिग, वोन, नागलिग, चल क्षेत्र के सरपंचों के साथ वन विभाग के अधिकारी सुरेश नपच्याल, विक्रम धामी, सागर मेहरा (वन रक्षक) भी सम्मिलित थे। टीम का नेतृत्व डॉ. विजय प्रसाद भट्ट, वैज्ञानिक ने किया।

प्रभागीय वनाधिकारी श्री आशुतोष सिंह ने बताया कि सीबकथोर्न, जिसे ‘हिमालय की संजीवनी’ भी कहा जाता है, पर्यावरणीय और औषधीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण पौधा है। इस पौधे से प्राप्त पल्प, बीज तेल और पत्तियाँ कैंसर, डायबिटीज और उच्च रक्तचाप जैसी गंभीर बीमारियों के उपचार में उपयोगी हैं। ड्रिल्यू (उच्च किस्म) की विशेषता इसके बड़े फल और अधिक उत्पादन में है।

भारत सरकार के राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड द्वारा संचालित इस परियोजना के माध्यम से गृहवृक्षारोपण, उत्पादन एवं विपणन को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे न केवल स्थानीय किसानों को रोजगार मिलेगा बल्कि बंजर भूमि को भी उपजाऊ बनाया जा सकेगा तथा पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलेगी।

देवभूमि खबर

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