राज्य आंदोलनकारी मंच के सम्मेलन में राज्य के भविष्य, पलायन, परिसीमन और बोली-भाषा के संरक्षण पर हुआ मंथन

देहरादून। उत्तराखण्ड राज्य आंदोलनकारी मंच के दो दिवसीय प्रदेश स्तरीय सम्मेलन के दूसरे और अंतिम दिन भी राज्य के भविष्य और आंदोलनकारियों के सपनों को लेकर गहन मंथन जारी रहा। पहले सत्र में ‘शहीदों के सपनों का उत्तराखण्ड कितना साकार हुआ’ विषय पर चर्चा हुई, जबकि दूसरे सत्र में बोली-भाषा, संस्कृति के संरक्षण, पलायन, परिसीमन और राज्य के अस्तित्व के सामने खड़ी चुनौतियों पर विचार-विमर्श किया गया।
नगर निगम के लाला जुगमंदर दास प्रेक्षागृह में आयोजित सम्मेलन में प्रदेशभर के साथ दिल्ली-एनसीआर और अन्य स्थानों से पहुंचे राज्य आंदोलनकारियों की बड़ी संख्या मौजूद रही।
पहले सत्र में मुख्य अतिथि कृषि एवं सैनिक कल्याण मंत्री गणेश जोशी ने राज्य आंदोलन में अपनी सक्रिय भागीदारी का उल्लेख करते हुए कहा कि उत्तराखण्ड की राजधानी गैरसैंण में हो, यह राज्य आंदोलन के शहीदों और आंदोलनकारियों का सपना रहा है। उन्होंने कहा कि गैरसैंण में विधानसभा सत्र के दौरान कई विधायक सत्र जल्द समाप्त करने की बात करते हैं, जबकि वहां विधायकों के लिए आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध हैं।
गणेश जोशी ने कहा कि सरकार ने गैरसैंण को पहले ही ग्रीष्मकालीन राजधानी का दर्जा देकर स्थायी राजधानी की दिशा में कदम बढ़ाया है। वहां आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जा रहा है। उन्होंने दो टूक कहा कि गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाया जाएगा और यह कार्य हमारी ही सरकार करेगी।
बदरीनाथ से कांग्रेस विधायक लखपत बुटोला ने कहा कि पलायन आज भी राज्य की बड़ी समस्या है। जनप्रतिनिधि तक पहाड़ छोड़कर मैदानी क्षेत्रों में बस रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि जनप्रतिनिधि ही पहाड़ की आवाज नहीं उठाएंगे तो फिर कौन उठाएगा।
उन्होंने पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार और स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति पर भी सवाल उठाए। कहा कि दूरदराज के क्षेत्रों में बाहरी राज्यों के युवा नौकरियां कर रहे हैं, जबकि पहाड़ के युवाओं के सामने रोजगार की चुनौती बनी हुई है। उन्होंने लोगों से राज्य के हित में जागरूक और एकजुट होकर आवाज उठाने का आह्वान किया।
इस सत्र में वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. महेश कुड़ियाल, पूर्व सूचना आयुक्त योगेश भट्ट, कवि डॉ. अतुल शर्मा, वरिष्ठ अधिवक्ता पृथ्वी सिंह नेगी, कांग्रेस नेत्री सुनीता प्रकाश, उत्तरांचल प्रेस क्लब अध्यक्ष अजय राणा और मंच अध्यक्ष जगमोहन सिंह नेगी सहित अन्य वक्ताओं ने विचार रखे।
दोपहर बाद आयोजित दूसरे सत्र में ‘उत्तराखण्ड की बोली, भाषा व संस्कृति का संरक्षण’ विषय पर चर्चा हुई। मुख्य अतिथि वन एवं स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि उत्तराखण्ड को उसकी विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर लंबे संघर्ष के बाद अलग राज्य बनाया गया था, लेकिन अब इसके अस्तित्व के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं।
उन्होंने लोगों से आगामी जनगणना में ‘अपनी गणना-अपने गांव’ अभियान के तहत अपने मूल गांव में गणना कराने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यदि पहाड़ की आबादी लगातार कम होती गई तो आगामी परिसीमन में पर्वतीय क्षेत्रों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है। उन्होंने पलायन को भी गंभीर चुनौती बताते हुए लोगों से अपने गांवों से जुड़ने की अपील की।
‘अपनी गणना-अपने गांव’ अभियान से जुड़े थौलधार के पूर्व ब्लॉक प्रमुख जोत सिंह बिष्ट ने कहा कि अपनी बोली-भाषा से विमुख होने के लिए हम स्वयं भी जिम्मेदार हैं। माता-पिता बच्चों के पहले शिक्षक और घर पहली पाठशाला है। यदि घर में बच्चों से अपनी बोली-भाषा में संवाद नहीं होगा तो वे उसे कैसे सीखेंगे।
उन्होंने परिसीमन के बाद पहाड़ के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और विकास योजनाओं पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को लेकर भी चिंता जताई तथा लोगों से अपने मूल गांव में जनगणना कराने की अपील की।
अखिल गढ़वाल सभा के अध्यक्ष रोशन धस्माना ने भ्रष्टाचार पर सवाल उठाते हुए कहा कि राज्य में सरकारों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जनता को अपने वोट की कीमत समझनी होगी।
उन्होंने कहा कि बोली-भाषा का संरक्षण केवल किताबों पर पुरस्कार देने से नहीं, बल्कि स्कूलों में स्थानीय भाषा को पढ़ाए जाने से होगा।
सचिवालय संघ के उपाध्यक्ष राकेश जोशी ने सचिवालय स्थित एटीएम चौक का नाम पर्वतीय गांधी इंद्रमणि बडोनी के नाम पर रखने की मांग की।
दूसरे सत्र में डोईवाला विधायक बृजभूषण गैरोला, राज्य बाल आयोग की पूर्व अध्यक्ष ऊषा नेगी, कर्मचारी नेता जीतमणि पैन्यूली, वरिष्ठ अधिवक्ता रमन शाह और पूर्व दायित्वधारी विजयलक्ष्मी गुसाईं सहित अन्य वक्ताओं ने विचार रखे।
दो दिवसीय सम्मेलन का संचालन विभिन्न सत्रों में जगमोहन नेगी, प्रदीप कुकरेती, रामलाल खंडूरी और भानु रावत ने किया। सम्मेलन का समापन विपिन सनवाल एवं शिवानी रावत की सांस्कृतिक टीम द्वारा प्रस्तुत गढ़वाली-कुमाऊंनी गीतों के साथ हुआ।
