नगर निगम देहरादून पर न्यायालय आदेश की अवहेलना का आरोप, संपत्ति विवाद में प्रार्थी ने उठाए सवाल
देहरादून। नगर निगम देहरादून एक लंबे समय से चले आ रहे संपत्ति विवाद को लेकर सवालों के घेरे में आ गया है। आरोप है कि निगम ने न्यायालय के स्पष्ट आदेशों एवं स्टे का पालन नहीं किया और विवादित संपत्ति में अन्य व्यक्तियों के नाम दर्ज कर दिए। मामला संपत्ति संख्या 149/138-142/131, पुराना नं. 89ए ब्लॉक-4, 501/501/1 खुड़बुड़ा व लाल झंडूमल क्वार्टर्स का है।
यह विवाद वर्ष 2016 से प्रारंभ हुआ। प्रार्थी अशोक कुमार गर्ग पुत्र स्व. रवि प्रकाश गर्ग ने 28 जून 2016 को नगर निगम के राजस्व अभिलेखों में अन्य नाम दर्ज किए जाने के खिलाफ आपत्ति दायर की थी। इसके बाद 3 नवम्बर 2016 को भी उन्होंने दूसरी आपत्ति प्रस्तुत की।
प्रार्थी पक्ष का कहना है कि न्यायालय के आदेशों और स्टे के बावजूद नगर निगम ने उनकी आपत्तियों पर कोई कार्रवाई नहीं की। उल्टा, निगम ने 18 जुलाई 2016 को मीना कुमारी इन्दुजा एवं रवीन्द्र कुमार के नाम संपत्ति दर्ज कर दी। इसके बाद 6 मई 2019 को अलोक कुमार गर्ग के निधन के उपरांत उनके पुत्र सौरभ गर्ग का नाम भी अभिलेखों में दर्ज कर दिया। प्रार्थी का आरोप है कि यह सब न्यायालय के आदेशों की अवहेलना कर किया गया।
न्यायालय आदेश का अनुपालन न होने पर अशोक कुमार गर्ग तथा बाद में उनके उत्तराधिकारी अशित कुमार गर्ग ने 2020 और 2021 में नगर निगम को पुनः पत्र भेजे। इन पत्रों में स्पष्ट कहा गया कि निगम ने स्टे आदेश और न्यायालय की स्पष्ट हिदायतों की अवहेलना की है और आपत्तियों का निस्तारण किए बिना नाम दर्ज कर दिए हैं।
5 अगस्त 2021 को भेजे गए पत्र में यह भी उल्लेख किया गया कि निगम द्वारा मृतक के नाम पर दर्ज नामों को निरस्त कर नए अभिलेख बनाए गए, जो कि नियमविरुद्ध है।
प्रार्थी ने नगर निगम से न्यायालय के 20 सितम्बर 2016 के आदेश का अनुपालन करने, दिनांक 28 जून 2016 व 3 नवम्बर 2016 की आपत्तियों का निस्तारण करने तथा 18 जुलाई 2016 और 6 मई 2019 को दर्ज किए गए नामों को निरस्त करने की मांग की है।
यह पूरा मामला नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। न्यायालय का स्पष्ट आदेश एवं स्टे होने के बावजूद वर्षों तक आपत्तियों का निस्तारण न किया जाना और विवादित संपत्ति में अन्य नाम दर्ज कर देना निगम की गंभीर लापरवाही माना जा रहा है। अब देखना यह होगा कि नगर निगम इस विवाद को कैसे सुलझाता है और क्या न्यायालय के आदेशों का अनुपालन करते हुए आपत्तियों का निस्तारण किया जाता है या नहीं।

