समाजोपयोगी शोध के माध्यम से जन समस्याओं के समाधान का स्थाई हल संभव: प्रोफेसर सुरेखा डंगवाल
देहरादून। दून विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग अंतर्गत डॉ. नित्यानंद हिमालयन रिसर्च एंड स्टडी सेंटर में 20 फरवरी 2026 को “हिमालयी क्षेत्र में जेंडर आधारित आजीविका जोखिम और अनुकूलन” विषय पर एक महत्वपूर्ण हितधारक संवाद का सफल आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में शिक्षाविदों, शोधार्थियों, पत्रकारों, गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधियों और समुदाय के सदस्यों ने भाग लेकर जलवायु संवेदनशीलता, लैंगिक जोखिमों तथा सतत अनुकूलन रणनीतियों पर व्यापक विचार-विमर्श किया।
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि दून विश्वविद्यालय की प्रोफेसर सुरेखा डंगवाल रहीं। कुलपति ने अपने संदेश में कहा की समाजोपयोगी शोध के माध्यम से जन समस्याओं के समाधान का स्थाई हल निकल सकता है और इस तरह के संवाद शोध की दिशा तय करने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है l संवाद का आयोजन भूगोल विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ. अभिलाषा कन्नौजिया द्वारा किया गया। उन्होंने इस बैठक का आयोजन ‘आजीविका की संवेदनशीलता पर लैंगिक गतिशीलता’ (gender dynamics on livelihood vulnerability) विषय पर अपनी चल रही परियोजना के तहत किया। साथ ही, उन्होंने आपदा जोखिम वाले क्षेत्रों में जोखिम को कम करने और अनुकूलन में नेतृत्वकर्ताओं के रूप में महिलाओं की भूमिका पर भी विशेष जोर दिया।स्कूल ऑफ मैनेजमेंट के डीन प्रो. एच.सी. पुरोहित ने अपने संबोधन में जलवायु अस्थिरता से जुड़ी चुनौतियों, स्थानीय आबादी पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव तथा यथार्थवादी जनसंख्या आधारित योजना की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
दून विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभागाध्यक्ष एवं स्कूल ऑफ सोशल साइंस के डीन प्रो. राजेंद्र पी. ममगाईं ने स्थानीय समुदायों की क्षमता निर्माण, संसाधन मानचित्रण तथा भूमि आधारित आजीविका से सांस्कृतिक जुड़ाव को सुदृढ़ करने में गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने चीड़ के वनों के वर्चस्व के कारण बार-बार लगने वाली वनाग्नि पर चिंता व्यक्त करते हुए यह भी कहा कि संरचित नीति सुझाव स्थानीय समुदायों तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच पा रहे हैं।
दून विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. विपिन कुमार ने सतत अनुकूलन रणनीतियों के विकास में कृषि वानिकी और भूवैज्ञानिक दृष्टिकोण की भूमिका पर चर्चा की। वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के अनुप्रयुक्त मनोविज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. अजय प्रताप सिंह ने आपदाओं के मनोवैज्ञानिक आयामों पर प्रकाश डालते हुए प्रभावित समुदायों में आघात और उससे निपटने की प्रक्रियाओं पर विचार साझा किए उन्होंने पारंपरिक ज्ञान को शोध के माध्यम से प्रमाणित एवं स्थापित करने पर जोर दिया।
पर्यावरण पत्रकार मेघा प्रकाश ने पर्वतीय क्षेत्रों में औषधीय जड़ी-बूटियों के क्लस्टर विकास की आवश्यकता और गैर-सरकारी संस्थाओं से सीमित संस्थागत सहयोग की ओर ध्यान आकर्षित किया। प्रगति एनजीओ, देहरादून की प्रतिनिधि श्रीमती सोनाली शर्मा ने श्रीमती निर्मला देवी और श्रीमती रीता नेगी के साथ सरकार समर्थित कृषि वानिकी पहलों की वकालत की, जो महिलाओं की आय वृद्धि और आर्थिक सशक्तिकरण में सहायक हो सकती हैं।
दून विश्वविद्यालय के मीडिया एवं संचार अध्ययन विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ. जूही प्रसाद ने दूरस्थ हिमालयी क्षेत्रों में महिलाओं को सशक्त बनाने और आजीविका को स्थायी बनाए रखने में सामुदायिक रेडियो की परिवर्तनकारी भूमिका पर प्रकाश डाला। सुश्री आबशार अब्बासी ने स्वास्थ्य और शिक्षा संबंधी जागरूकता फैलाने तथा आपातकालीन संचार की चुनौतियों के समाधान में सामुदायिक रेडियो के महत्व को विस्तार से बताया।
उत्तरकाशी जनपद के भटवाड़ी ब्लॉक से आईं जमीनी स्तर की प्रतिनिधियों श्रीमती प्रतिभा बिष्ट, श्रीमती अनीता राणा, श्रीमती रीता बिष्ट और श्रीमती भारती बिष्ट ने जेंडर आधारित आजीविका जोखिमों से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने स्वयं सहायता समूहों के संचालन और समुदाय स्तर पर चल रही पहलों के माध्यम से लचीलापन बढ़ाने के प्रयासों की जानकारी दी।
कार्यक्रम दो सत्रों में आयोजित हुआ। पहले सत्र में विषय पर खुली चर्चा हुई, जिसमें गणमान्य अतिथियों, शोधकर्ताओं और प्रतिभागियों ने अपने विचार रखे। दूसरे सत्र में नीति संबंधी सुझावों और समापन टिप्पणियों के माध्यम से भविष्य की कार्ययोजना के लिए प्रमुख बिंदुओं को संकलित किया गया।
भूगोल विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ. पल्लवी उप्रेती और डॉ. सोनू कौर ने फसल विविधीकरण और संसाधन मानचित्रण को महत्वपूर्ण अनुकूलन रणनीति के रूप में रेखांकित किया। भूगोल विभाग के शोधार्थियों ने भी सक्रिय भागीदारी करते हुए संवाद को शैक्षणिक और व्यावहारिक दृष्टि से समृद्ध बनाया।
यह हितधारक संवाद एक प्रभावी और सहयोगात्मक अकादमिक मंच के रूप में उभरा, जिसने हिमालयी क्षेत्र में जेंडर संवेदनशील जलवायु अनुकूलन के लिए अंतर्विषयक समझ और क्रियान्वयन योग्य नीति सुझावों को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

