दून में बढ़ता नशे का कारोबार- युवाओं के भविष्य पर मंडराता खतरा

दून में बढ़ता नशे का कारोबार- युवाओं के भविष्य पर मंडराता खतरा
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अखिलेश व्यास

देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून लंबे समय से अपनी प्राकृतिक सुंदरता, शैक्षणिक संस्थानों और शांत वातावरण के लिए जानी जाती रही है। देशभर से छात्र यहां शिक्षा प्राप्त करने आते हैं और बड़ी संख्या में पर्यटक भी देहरादून को अपना पसंदीदा गंतव्य मानते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में शहर एक ऐसी चुनौती का सामना कर रहा है, जो समाज और आने वाली पीढ़ी दोनों के लिए चिंता का विषय बन चुकी है। यह चुनौती है—नशे के बढ़ते कारोबार की।

पुलिस की लगातार कार्रवाई के बावजूद नशा तस्करों के नेटवर्क लगातार नए तरीके अपनाकर अपना कारोबार फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। वर्ष 2026 के पहले पांच महीनों में दून पुलिस द्वारा 145 नशा तस्करों की गिरफ्तारी और लगभग तीन करोड़ रुपये मूल्य के मादक पदार्थों की बरामदगी इस बात का संकेत है कि समस्या कितनी गंभीर होती जा रही है। बरामद मादक पदार्थों में स्मैक, चरस, गांजा, कोकीन, नशीली गोलियां और कैप्सूल शामिल हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि नशा तस्करों का सबसे बड़ा लक्ष्य युवा वर्ग है। देहरादून में बड़ी संख्या में स्कूल, कॉलेज और प्रोफेशनल संस्थान हैं, जहां विभिन्न राज्यों से छात्र पढ़ने आते हैं। तस्कर इसी वर्ग को अपने जाल में फंसाने की कोशिश करते हैं। शुरुआत अक्सर पार्टी, दोस्तों के दबाव या जिज्ञासा के नाम पर होती है, लेकिन धीरे-धीरे यह आदत लत में बदल जाती है।

नशे की गिरफ्त में आने वाला युवा न केवल अपना भविष्य खतरे में डालता है, बल्कि उसका परिवार भी मानसिक, सामाजिक और आर्थिक संकट का सामना करता है।

हाल के वर्षों में पुलिस कार्रवाई में यह तथ्य सामने आया है कि नशे का कारोबार अब केवल गली-मोहल्लों तक सीमित नहीं है। कोकीन जैसे महंगे मादक पदार्थों की सप्लाई हाई-प्रोफाइल पार्टियों और विशेष आयोजनों तक पहुंच चुकी है। हाल ही में राजपुर क्षेत्र में कोबरा गैंग से जुड़े विदेशी तस्करों की गिरफ्तारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि देहरादून अब बड़े ड्रग नेटवर्क की नजर में है।

पुलिस जांच में कई मामलों में दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और अन्य राज्यों से नशे की खेप आने की बात सामने आई है। कुछ मामलों में विदेशी नागरिकों की संलिप्तता भी मिली है, जिससे यह संकेत मिलता है कि तस्करी का नेटवर्क स्थानीय सीमाओं से कहीं अधिक व्यापक हो चुका है।

देहरादून की भौगोलिक स्थिति भी नशा तस्करों के लिए अनुकूल मानी जाती है। राजधानी होने के कारण यहां सड़क, रेल और हवाई संपर्क बेहतर है। साथ ही यह कई राज्यों से जुड़ा हुआ है। ऐसे में तस्करों के लिए मादक पदार्थों की आपूर्ति और वितरण अपेक्षाकृत आसान हो जाता है।
इसके अलावा पर्यटन और छात्र आबादी की अधिकता भी तस्करों को संभावित बाजार उपलब्ध कराती है।

दून पुलिस लगातार ऑपरेशन प्रहार जैसे अभियानों के माध्यम से नशा तस्करों पर कार्रवाई कर रही है। बड़ी मात्रा में मादक पदार्थों की बरामदगी और लगातार गिरफ्तारियां पुलिस की सक्रियता को दर्शाती हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल गिरफ्तारी से समस्या का पूर्ण समाधान संभव नहीं है।

जब तक नशे की मांग बनी रहेगी, तब तक तस्कर नए रास्ते खोजते रहेंगे। इसलिए कानून प्रवर्तन के साथ-साथ जागरूकता, परामर्श और पुनर्वास पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है।

नशे के खिलाफ लड़ाई केवल पुलिस या प्रशासन नहीं जीत सकता। इसमें अभिभावकों, शिक्षकों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। परिवारों को बच्चों के व्यवहार में आने वाले बदलावों पर नजर रखनी होगी। शिक्षण संस्थानों को नियमित जागरूकता कार्यक्रम चलाने होंगे और समाज को नशे के प्रति “शून्य सहिष्णुता” का वातावरण तैयार करना होगा।

देहरादून में बढ़ता नशे का कारोबार केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक चिंता का विषय है। पुलिस की कार्रवाई ने कई बड़े नेटवर्कों को तोड़ा है, लेकिन यह लड़ाई अभी लंबी है। यदि प्रशासन की सख्ती, समाज की जागरूकता और युवाओं की सकारात्मक भागीदारी एक साथ आगे बढ़ती है, तभी देहरादून और उत्तराखंड को नशे के खतरे से सुरक्षित रखा जा सकेगा। नशे के खिलाफ यह संघर्ष केवल अपराधियों के विरुद्ध नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बचाने की लड़ाई है।

देवभूमि खबर

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