सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद अवैध वसूली का मामला लंबित, सचिवालय संघ ने मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग की

देहरादून। उत्तराखण्ड सचिवालय संघ ने निजी सचिव संवर्ग एवं लेखा संवर्ग के अधिकारियों और कर्मचारियों से की जा रही कथित अवैध वसूली के लंबे समय से लंबित प्रकरण में मुख्यमंत्री से शीघ्र हस्तक्षेप की मांग की है। संघ ने सचिव, मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर मामले में त्वरित एवं न्यायोचित निर्णय लेने का आग्रह किया है।
संघ का कहना है कि यह प्रकरण कई वर्षों से लंबित है, जिसके कारण अनेक सेवानिवृत्त और सेवारत अधिकारी आर्थिक, मानसिक एवं पारिवारिक परेशानियों का सामना कर रहे हैं। कई कर्मचारियों के सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले देयकों का भुगतान भी इस विवाद के चलते अटका हुआ है, जिससे उन्हें अनावश्यक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
पत्र में उल्लेख किया गया है कि संबंधित पत्रावली कई महीनों से उच्च स्तर पर विचाराधीन है। यदि इस पर शीघ्र निर्णय लिया जाता है तो वर्षों से लंबित इस मामले का न्यायसंगत समाधान संभव हो सकेगा।
सचिवालय संघ ने अपने पत्र में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले “स्टेट ऑफ पंजाब बनाम रफीक मसीह (2015) 4 SCC 334” का हवाला देते हुए कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों, सेवानिवृत्त कर्मचारियों तथा सेवानिवृत्ति के निकट पहुंच चुके कर्मचारियों से पांच वर्ष से अधिक पुराने कथित अधिक भुगतान की वसूली नहीं की जानी चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा है कि ऐसी वसूली, यदि अत्यधिक कठोर, अन्यायपूर्ण या मनमानी हो, तो उसे लागू नहीं किया जाना चाहिए।
संघ का कहना है कि वर्तमान मामला सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के अनुरूप है। इसके बावजूद अब तक कोई निर्णय न होना प्रभावित कर्मचारियों के साथ न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। संघ ने मांग की है कि कथित अवैध वसूली की कार्रवाई समाप्त करते हुए प्रभावित अधिकारियों एवं कर्मचारियों के सभी लंबित देयकों का तत्काल भुगतान सुनिश्चित किया जाए।
उत्तराखण्ड सचिवालय संघ ने विश्वास जताया है कि कर्मचारी हितों के प्रति संवेदनशील मुख्यमंत्री इस मामले में शीघ्र सकारात्मक निर्णय लेकर प्रभावित अधिकारियों और कर्मचारियों को न्याय दिलाने की दिशा में आवश्यक कदम उठाएंगे।

