शिव-सिद्धियोग में मनाई जाएगी महाशिवरात्रि : रसिक महाराज

शिव-सिद्धियोग में मनाई जाएगी महाशिवरात्रि : रसिक महाराज
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टिहरी)। शिव और शक्ति के मिलन के पर्व महाशिवरात्रि पर इस साल कई खास योग बन रहे हैं। 11 मार्च को पड़ रही महाशिवरात्रि के दिन शिवयोग, सिद्धियोग और घनिष्ठा नक्षत्र का संयोग आने से पर्व की महत्ता और अधिक बढ़ गई है। ऐसे में महाशिवरात्रि पर्व की पूजा विधि-विधान के साथ करने से विशेष कल्याणकारी मानी जा रही है।

महाशिवरात्रि देवों के देव महादेव शिव-शंभू, भोलेनाथ शंकर की आराधना, उपासना का त्यौहार है। महाशिवरात्रि पर्व फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी युक्त चतुर्दशी को मनाया जाता है। 11 मार्च गुरुवार को त्रयोदशी और चतुर्दशी मिल रही है। वहीं महाशिवरात्रि का पर्व शिव योग, सिद्धि योग के दुर्लभ संयोग के साथ आने से और भी अधिक प्रभावकारी बताया जा रहा है। पुराणों में वर्णन है कि भगवान शिव और मां पार्वती का विवाह इसी दिन हुआ था। भगवान शिव के विवाह में सिर्फ देव ही नहीं दानव, किन्नर, गंधर्व, भूत, पिशाच भी इस विवाह में शामिल हुए थे। महाशिवरात्रि पर शिवलिंग को गंगाजल, दूध, घी, शहद और शक्कर के मिश्रण से शिवलिंग को स्नान करवाया जाता है। फिर चंदन लगाकर फल-फूल, बेलपत्र, धतूरा, बेर इत्यादि अर्पित किए जाते हैं। रात्रि की प्रथम प्रहर की पूजा 7 बजकर 26 मिनट से शुरू होगी। निशिता काल की पूजा का समय रात्रि 12 बजकर 59 मिनट से 1 बजकर 47 मिनट तक रहेगी। वैज्ञानिक दृष्टि से महाशिवरात्रि की रात्रि बहुत विशेष होती है। दरअसल, इस रात्रि ग्रह का उत्तरी गोलार्द्ध इस तरह अवस्थित होता है कि इंसान के अंदर की उर्जा प्राकृतिक तौर पर उपर की तरफ बढ़ने लगती है। यानी प्रकृति खुद ही मानव को उसके आध्यात्मिक शिखर तक जाने में सहायता करती है। इसका पूरा फायदा लोगों को तभी प्राप्त हो सकता है, जब महाशिवरात्रि की रात्रि में जागरण किया जाए। साथ ही रीढ़ की हड्डी को सीधा रखा जाए। नृसिंह पीठाधीश्वर स्वामी रसिक महाराज के मुताबिक देव गुरु का वार बृहस्पति है। उस दिन संयोगवश शिवयोग है। साथ ही बृहस्पति की उपस्थिति मकर राशि में और चंद्रमा की उपस्थिति भी धनिष्ठा नक्षत्र एवं मकर राशि में है। इससे एक गज केसरी योग का निर्माण हो रहा है। जो अद्भुत माना जाता है मंत्र और यंत्र की सिद्धि के लिए बहुत बड़ा संयोग बन रहा है।

शिवरात्रि का पौराणिक महत्व

शिव पुराण के अनुसार इस दिन शिव और शक्ति का मिलन हुआ था। इसलिए इस रात्रि को वर्ष की चार विशेष रात्रि में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इस रात्रि भर जागरण करने से सकल मनोकामनाएं पूर्ण होती है। यद्यपि सभी राशियों के जातकों को बिल्वपत्र धतूरा भांग गंगा जल दूध तिल भगवान शिव का स्तवन और पूजन करना चाहिए। परंतु राशि अनुसार विशिष्ट पूजन से शीघ्र फल की प्राप्ति होती है।

राशि अनुसार इस प्रकार करें पूजन

मेष राशि-लाल चंदन धतूरा और गंगाजल से

वृष राशि- सफेद चंदन दूध सफेद फूलों से।

मिथुन राशि- पीला चंदन गंगाजल बिल्वपत्र से।

कर्क राशि- सफेद चंदन दूध सफेद तिल गंगाजल से।

सिंह राशि- लाल चंदन काले तिल भांग के पत्तों से

कन्या राशि- सफेद फूल गंगाजल एवं तुलसी पत्र से।

तुला राशि- सफेद तिल सफेद फूल और कुमकुम से।

वृश्चिक राशि- लाल चंदन काले तिल गुड़हल के फूलों से।

धनु राशि- जौ तिल गंगाजल और दूध से।

मकर राशि- काले तिल लाल चंदन बिल्वपत्र से।

कुंभ राशि- काले तिल सफेद चंदन गंगाजल कुमकुम से।

मीन राशि- जौ तिल गंगाजल धतूरा के पुष्पों से

देवभूमि खबर

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