पंच महाभूतों का संरक्षण सतत विकास की प्रमुख कड़ी : राज्यपाल
देहरादून।उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह ने आज दून विश्वविद्यालय में आयोजित इंडियन एसोसिएशन ऑफ सोशल साइंस इंस्टिट्यूशन्स (IASSI) के 24वें वार्षिक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित किया। उन्होंने हिमालयी क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुरूप एक परिवर्तनकारी (transformative) विकास मॉडल अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। राज्यपाल ने कहा कि पांच महाभूतों के संरक्षण की नीति ही सतत विकास की प्रमुख कड़ी है क्योंकि हमारी गतिविधियां मुख्य रूप से इन्हीं तत्वों पर निर्भर रहती है l
राज्यपाल ने शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, नीति-निर्माताओं और विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि इस सम्मेलन में हुई शैक्षणिक चर्चा के निष्कर्ष केवल कागज़ों तक सीमित न रहें, बल्कि इन्हें नीति निर्माण के ठोस सुझावों में बदला जाए ताकि इनका सीधा लाभ समाज को मिल सके।
उन्होंने कहा कि विकास को केवल आर्थिक संकेतकों से नहीं, बल्कि मानवीय संकेतकों से भी मापा जाना चाहिए—ऐसे संकेतक जो सबसे कमजोर वर्गों के जीवन की गुणवत्ता (quality of life) को दर्शाएं। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य जलवायु परिवर्तन (climate change) के बढ़ते प्रभावों—जैसे बादल फटना और भूस्खलन—का सीधा सामना कर रहे हैं। इसलिए विकास की नई परिभाषा में पारिस्थितिक संतुलन (ecological sensitivity) और सामाजिक न्याय (social justice) को समान रूप से शामिल करना होगा।
राज्यपाल ने युवाओं से विशेष रूप से अपील की कि वे इस परिवर्तन के अग्रदूत बनें—नवाचार (innovation), उद्यमिता (entrepreneurship), और जलवायु कार्रवाई (climate action) के माध्यम से। उन्होंने कहा कि युवा शोधकर्ता और विद्यार्थी न केवल भविष्य के नेता हैं, बल्कि वर्तमान में भी परिवर्तन के उत्प्रेरक (catalysts of transformation) बन सकते हैं, जो एक शांतिपूर्ण और सतत (sustainable) उत्तराखंड के निर्माण में योगदान देंगे।
दून विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर सुरेखा डंगवाल ने राज्यपाल का स्वागत करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय लगातार उच्च-स्तरीय शोध और सार्थक अकादमिक संवाद को बढ़ावा दे रहा है, जिससे नीति निर्माण को दिशा मिल सके। उन्होंने कहा कि दून विश्वविद्यालय का उद्देश्य अकादमिक रिसर्च और गवर्नेंस के बीच की दूरी को कम करना है, ताकि प्रमाण-आधारित (evidence-based) निष्कर्षों के ज़रिए नीतियाँ अधिक समावेशी और प्रभावी बन सकें।
यूनेस्को की असिस्टेंट डायरेक्टर जनरल फॉर सोशल एंड ह्यूमन साइंसेज गैब्रिएला रामोस ने अपने मुख्य वक्तव्य में राज्यपाल की दृष्टि का समर्थन किया और इसे वैश्विक परिप्रेक्ष्य में रखा। उन्होंने कहा कि वर्तमान वैश्विक आर्थिक ढाँचा असमानता (inequality) को बढ़ा रहा है और टिकाऊ विकास (sustainability) को कमजोर कर रहा है। उनके अनुसार,‘विकास अपने आप नीचे तक पहुँचेगा’ वाला सिद्धांत अब असफल साबित हुआ है। उन्होंने कहा कि यह असमानता कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सिस्टम की विफलता है, जिसे जड़ से सुधारने की ज़रूरत है।
रामोस ने डिजिटल असमानता (digital divide) की समस्या पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि तकनीकी नवाचार (technological innovation) कुछ ही देशों—मुख्यतः अमेरिका, ब्रिटेन और चीन—तक सीमित है, जिससे वैश्विक स्तर पर असमानता और गहरी हो रही है। इससे बड़ी आबादी अवसरों और निर्णय लेने की शक्ति से वंचित रह जाती है। उन्होंने तकनीक को “public good” के रूप में अपनाने और बहिष्करण (exclusion) को घटाने वाले विकास मॉडल की मांग की।
अपने वक्तव्य के अंत में, रामोस ने संस्थागत सुधारों (institutional reforms) पर ज़ोर देते हुए कहा कि न्यायसंगत विकास के लिए शिक्षा और कौशल-विकास (skill-building) में निवेश बढ़ाना विशेष रूप से ग्लोबल साउथ देशों के लिए आवश्यक है।
सम्मेलन के आयोजन सचिव और स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज़ के डीन, प्रोफेसर आर. पी. ममगाईं ने बताया कि तीन दिनों तक चले इस सम्मेलन में भारत और विदेशों से आए 400 से अधिक प्रतिभागियों—सामाजिक वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं और युवा शोधकर्ताओं—ने भाग लिया। सम्मेलन का फोकस जलवायु परिवर्तन, नगरीकरण (urbanisation) और आजीविका (livelihoods) जैसे आपस में जुड़े विषयों पर रहा।
सम्मेलन के दौरान 250 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत किए गए, जिनमें जलवायु अनुकूलित कृषि, शहरी संरचना, महिला उद्यमिता, और प्रशासन और आपदा में तकनीक का एकीकरण जैसे विषयों पर विशेष सत्र आयोजित किए गए। इन चर्चाओं का उद्देश्य यह समझना था कि विकास को कैसे अधिक टिकाऊ, समावेशी और पर्यावरण के अनुकूल बनाया जा सकता है।
तीसरे दिन प्रमुख प्रस्तुतियाँ देने वालों में डॉ. नागेश कुमार (डायरेक्टर एवं मुख्य कार्यकारी, इंस्टिट्यूट ऑफ स्टडीज़ इन इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट, नई दिल्ली), प्रोफेसर एस. महेन्द्र देव (अध्यक्ष, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद), प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी (कुलपति, नालंदा विश्वविद्यालय), और अर्थशास्त्री डॉ. अजीत रानाडे, डॉ. सब्यसाची साहा, डॉ. एस. के. मोहंती, डॉ. दीपंकर सेनगुप्ता आदि शामिल रहे।
कार्यक्रम के अंत में यह साझा समझ उभरी कि शोध और नीति निर्माण के बीच की दूरी को पाटना आवश्यक है। आर्थिक विकास का असली उद्देश्य लोगों के जीवन में वास्तविक सुधार लाना होना चाहिए, वह भी पर्यावरणीय संतुलन के साथ। यह भी सहमति बनी कि विकास और पर्यावरण सुरक्षा एक-दूसरे के पूरक हैं; नगरीकरण को सोच-समझकर आगे बढ़ाना होगा; और आर्थिक प्रगति का अर्थ तभी सार्थक होगा जब वह सभी के लिए बेहतर आजीविका सुनिश्चित करे।
