नेपाल त्रासदी पर भूवैज्ञानिक डॉ. दीपक भट्ट की चेतावनी: हिमस्खलन, भूस्खलन और कृत्रिम बांध से बढ़ी तबाही की तीव्रता

नेपाल त्रासदी पर भूवैज्ञानिक डॉ. दीपक भट्ट की चेतावनी: हिमस्खलन, भूस्खलन और कृत्रिम बांध से बढ़ी तबाही की तीव्रता
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देहरादून। नेपाल में आई भीषण प्राकृतिक आपदा को लेकर डीबीएस पीजी कॉलेज देहरादून के भूविज्ञान विभागाध्यक्ष एवं भूवैज्ञानिक डॉ. दीपक भट्ट ने घटना के संभावित भूवैज्ञानिक कारणों और भविष्य में ऐसी त्रासदियों से बचाव को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है।

डॉ. भट्ट के अनुसार, प्रभावित क्षेत्र में छोटे-छोटे हिमनद मौजूद हैं और इस घटना का संबंध भोटे कोसी नदी से भी जुड़ा हुआ है। हिमस्खलन एवं अत्यधिक वर्षा के बाद हुए भूस्खलन और उसके चलते बने अस्थायी अथवा कृत्रिम बांध ने हालात को और गंभीर बना दिया। बांध के टूटने या उसके ऊपर से पानी के दबाव के साथ बड़ी मात्रा में स्लरी (कीचड़) नीचे की ओर बहने से आपदा की तीव्रता कई गुना बढ़ गई।

उन्होंने बताया कि भोटे कोसी नदी का प्रवाह आगे त्रिशूली, नारायणी और गंडक नदी तंत्र से जुड़ता है। तेज ढलान वाले इस पूरे नदी घाटी क्षेत्र में अचानक बड़ी मात्रा में पानी, मलबे और कीचड़ के बहाव ने रास्ते में आने वाली बस्तियों को अपनी चपेट में ले लिया।

डॉ. भट्ट के अनुसार, प्रारंभिक अनुमान के आधार पर करीब 150 से 200 गांवों के प्रभावित होने की आशंका है। उन्होंने कहा कि कई गांवों में बड़ी संख्या में लोग निवास करते हैं, जिसके कारण इस तरह की आपदा का मानवीय प्रभाव अत्यंत गंभीर हो सकता है।

उन्होंने बताया कि भोटे कोसी से लेकर नीचे त्रिशूली तक घाटी में तीव्र ढलान होने के कारण पानी और मलबे के प्रवाह ने अत्यधिक वेग पकड़ लिया। अचानक आए इस तेज बहाव ने लोगों को संभलने और सुरक्षित स्थानों पर पहुंचने तक का पर्याप्त अवसर नहीं दिया।

भूवैज्ञानिक डॉ. दीपक भट्ट ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में ऐसी प्राकृतिक घटनाओं की पुनरावृत्ति की संभावना बनी रहेगी। हिमस्खलन, भारी वर्षा, भूस्खलन और नदी के अचानक उफान जैसी घटनाओं को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन वैज्ञानिक अध्ययन, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, सुरक्षित बसावट और प्रभावी आपदा प्रबंधन के माध्यम से जान-माल की क्षति को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि पहाड़ों में विकास और ग्रामीण जीवन के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने की आवश्यकता है। नदी घाटियों और भूस्खलन संभावित क्षेत्रों में बसावट को लेकर वैज्ञानिक मानकों का पालन तथा समय रहते चेतावनी और सुरक्षित निकासी की व्यवस्था ऐसी आपदाओं के प्रभाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

देवभूमि खबर

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