एक्टिंग एंड बियोंड” पुस्तक का लोकार्पण, रंगमंच और अभिनय पर हुई गहन चर्चा
देहरादून। दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में प्रसिद्ध रंगकर्मी, नाट्य निर्देशक और इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा लिखित पुस्तक “एक्टिंग एंड बियोंड” का भव्य लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर प्रसिद्ध नाटककार राकेश, अभिनेत्री एवं रंगकर्मी वेदा और रंगकर्मी डॉ. वी. के. डोभाल ने संयुक्त रूप से पुस्तक का विमोचन किया।
पुस्तक के लेखक प्रसन्ना ने बताया कि इस पुस्तक की रचना का विचार उन्हें वर्षों पहले आया था, लेकिन वे इसे केवल तकनीकी शब्दजाल से भरी किताब नहीं बनाना चाहते थे। उन्होंने कहा कि “रंगमंच सजीव संवाद और मानवीय अभिव्यक्ति के लिए है, जबकि आधुनिक डिजिटल मनोरंजन ने इसे एक स्वचालित प्रक्रिया बना दिया है।”
उन्होंने बताया कि “आज के दौर में अभिनेता एक प्रेरित अभिनय प्रक्रिया से दूर हो गए हैं, और यह पुस्तक उन्हें फिर से वास्तविक अभिनय प्रक्रिया से जोड़ने का प्रयास करती है। यह न केवल कलाकारों के लिए बल्कि नागरिकों के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।”
इप्टा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नाटककार राकेश वेदा ने कहा कि संवाद अदायगी में सत्य तभी झलकता है जब वह किसी क्रिया के बाद बोला जाए। उन्होंने समाज में बढ़ते अव्यवस्थित संवाद और सोशल मीडिया की अराजकता पर भी चिंता जताई।
उन्होंने कहा, “आज हर कोई बस बोलता जा रहा है, बिना यह सोचे कि उसके शब्द सत्य हैं या असत्य। डिजिटल युग ने क्रिया, प्रेरणा और उत्पादकता को छीन लिया है। यही कारण है कि आज के समय में वास्तविक अभिनय प्रक्रिया को समझना और अपनाना और भी आवश्यक हो गया है।”
प्रसन्ना ने कहा कि उन्हें सच्ची क्रिया का महत्व तब समझ में आया जब उन्होंने एक ग्राम्य हथकरघा सहकारी संस्था ‘चरखा’ में काम किया। उन्होंने कहा, “हमारे देश की आध्यात्मिक परंपरा का मूल आधार श्रम रहा है, जिसे गांधीजी ने चरखे के रूप में अपनाया।”
उन्होंने आगे बताया कि इस पुस्तक को और अधिक अनुभव-सिद्ध बनाने के लिए उन्होंने खुद को मुंबई की ‘अभिनय बस्ती’ में स्थापित किया। वहां उन्होंने संघर्षरत युवाओं से मुलाकात की और अभिनय की वास्तविकता को करीब से समझा।
प्रसन्ना ने कहा कि “ग्लैमर इंडस्ट्री की क्रूर सच्चाई यह है कि एक सुपरस्टार बनाने के लिए हजारों नॉन-स्टार्स बनाए जाते हैं। यह एक गेटोकरण (बस्तीकरण) है, जो राष्ट्रीय संकट से कम नहीं है।”
उन्होंने चिंता जताई कि “मुंबई की ग्लैमर इंडस्ट्री ने हजारों युवाओं को एक ऐसे अंधकूप में डाल दिया है, जहां से बाहर निकलना मुश्किल है।” उन्होंने यह भी कहा कि “यदि भगत सिंह और विवेकानंद भी इस दौर में होते, तो शायद वे भी इस चकाचौंध की चपेट में आ सकते थे।”
इस अवसर पर प्रसन्ना और राकेश वेदा ने बच्चों के लिए अभिनय कार्यशाला भी आयोजित की, जिसमें विभिन्न स्कूलों के 200 से अधिक बच्चों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यशाला में खेल-खेल में नाटक तैयार करने की विधि सिखाई गई।
बच्चों और शिक्षकों ने इस पहल की सराहना की और कहा कि “ऐसे कार्यक्रम और अधिक होने चाहिए, ताकि बच्चों को रंगमंच और अभिनय की मूलभूत समझ मिल सके।”
इस कार्यक्रम का संचालन हरिओम पाली ने किया। कार्यक्रम में मेघा विल्सन, चंद्रशेखर तिवारी, इप्टा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. वी. के. डोभाल, बीजू नेगी, दीपू सकलानी, निकोलस, अशोक अकेला, ममता कुमार, सतीश धौलाकंडी, धर्मानंद लखेड़ा, गर्विता, विक्रम पुंडीर, डॉ. अतुल शर्मा, जगमोहन मेहंदीरत्ता, वंशिका, गौरी, नवनीत गैरोला, कैलाश कंडवाल सहित कई प्रतिष्ठित रंगकर्मी, शिक्षक और अभिभावक उपस्थित रहे।

