दून विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय संगोष्ठी,उत्तराखंड में जनजातीय विकास हेतु सह-प्रबंधन दृष्टिकोण अपनाने पर जोर
देहरादून। दून विश्वविद्यालय में आज “सह-प्रबंधन की दिशा में : सरकारी नीतियाँ, स्वदेशी परंपराएँ और सतत विकास” विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई।
इस संगोष्ठी में शिक्षाविदों, नीति-निर्माताओं, प्रशासकों, जनजातीय प्रतिनिधियों, नागरिक समाज के सदस्यों तथा शोधार्थियों ने भाग लिया। प्रतिभागियों ने उत्तराखंड में जनजातीय विकास नीति में मूलभूत परिवर्तन तथा सतत विकास आधारित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
मानवशास्त्र विभाग, अर्थशास्त्र विभाग तथा डॉ. अंबेडकर चेयर द्वारा जनजातीय अनुसंधान केंद्र के सहयोग से संयुक्त रूप से आयोजित इस संगोष्ठी में ऐसे सहभागी मॉडल विकसित करने पर विचार किया गया जो पारिस्थितिक संतुलन, आजीविका सुरक्षा और सांस्कृतिक निरंतरता को एकीकृत करें तथा कल्याण आधारित दृष्टिकोण से आगे बढ़कर सहभागी सह-प्रबंधन को केंद्र में रखें।
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए विकासनगर से विधायक श्री मुन्ना सिंह चौहान ने हिमालयी परिस्थितियों के अनुरूप समग्र विकास रणनीति की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि जनजातीय क्षेत्रों में विकास हस्तक्षेपों को आजीविका, पारिस्थितिकी, संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को समेकित करना चाहिए, न कि केवल खंडित कल्याणकारी उपायों पर निर्भर रहना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि सामुदायिक संसाधन प्रबंधन और सामूहिक भूमि व्यवस्था जैसी अनेक आधुनिक विकास अवधारणाएँ जनजातीय समाजों में पहले से विद्यमान रही हैं और समकालीन नीति-निर्माण के लिए मार्गदर्शक बन सकती हैं। उन्होंने समावेशी शासन पर बल देते हुए कहा कि स्थायी परिणाम तभी प्राप्त होंगे जब समुदाय विकास योजना और क्रियान्वयन में सक्रिय भागीदार बनें।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए, जिसमें उत्तराखंड तथा अन्य राज्यों से आए 200 से अधिक प्रतिभागी सम्मिलित हुए, दून विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल ने कहा कि हाल ही में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर हुए परामर्शों ने शहरी नीति विमर्श और जनजातीय समुदायों की वास्तविक जीवन स्थितियों के बीच अंतर को स्पष्ट रूप से सामने रखा है। इन परामर्शों से यह भी स्पष्ट हुआ कि जनजातीय समुदाय परंपराओं से गहराई से जुड़े होने के साथ-साथ विकास और शासन के प्रश्नों पर सक्रिय रूप से विचार करते हैं। प्रतिभागियों ने प्रदर्शित किया कि जनजातीय समाज नीति के निष्क्रिय प्राप्तकर्ता नहीं, बल्कि सक्रिय योगदानकर्ता हैं जिनकी पारंपरिक ज्ञान प्रणालियाँ और सतत जीवन-पद्धतियाँ समावेशी तथा पर्यावरणीय संतुलन वाले विकास की दिशा दिखाती हैं। चर्चाओं में सांस्कृतिक गर्व की मजबूत भावना उभरकर सामने आई और कई समुदायों ने अपने पैतृक क्षेत्रों में ही रहने की इच्छा व्यक्त की, जिससे स्थानीय और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील विकास दृष्टिकोण की आवश्यकता स्पष्ट होती है। उन्होंने कहा कि महिला प्रतिभागियों ने भी महत्वपूर्ण और विचारोत्तेजक सुझाव देकर चर्चा को समृद्ध किया।
प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए सामाजिक विज्ञान संकाय के अधिष्ठाता प्रो. आर. पी. ममगlई ने संगोष्ठी के मुख्य विषय और उप-विषयों पर प्रकाश डालते हुए सह-प्रबंधन को समावेशी और सतत विकास की दिशा बताया। उन्होंने विकास की प्रक्रिया में निचले स्तर से ऊपर की ओर जाने वाले दृष्टिकोण की आवश्यकता रेखांकित की तथा वन पंचायतों जैसी स्थानीय संस्थाओं की सहभागी शासन और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन में महत्त्वपूर्ण भूमिका पर बल दिया। उन्होंने नीति-निर्माताओं, शैक्षणिक संस्थानों और जनजातीय समुदायों के बीच निरंतर संवाद की आवश्यकता भी बताई।
विशेष संबोधन में जनजातीय अनुसंधान संस्थान के अतिरिक्त निदेशक श्री योगेंद्र सिंह रावत ने जनजातीय समाजों की आत्मनिर्भरता पर प्रकाश डालते हुए उनकी संस्कृति के संरक्षण की आवश्यकता बताई। उन्होंने विशेष रूप से राजी और बुक्सा जैसी अत्यंत संवेदनशील जनजातीय समूहों के कल्याण हेतु प्रधानमंत्री जनजातीय आदिम जनजाति मिशन (पीएम-जनमन) जैसी पहलों का उल्लेख किया तथा वन अधिकार अधिनियम, 2006 के प्रभावी क्रियान्वयन पर बल दिया।
प्रख्यात मानवशास्त्री, इतिहासकार और सांस्कृतिक कार्यकर्ता डॉ. लोकेश ओहरी ने गंगोत्री के निकट हर्षिल घाटी में रहने वाले जाड़ भोटिया समुदाय की संस्कृति पर मंडराते खतरों पर चर्चा की। उन्होंने जाड़ समुदाय के लाल देवता या मेपरांग की परंपरा का उल्लेख करते हुए भारत-चीन संघर्ष के कारण व्यापार मार्गों के बंद होने तथा ‘वाइब्रेंट इंडिया’ योजना से उत्पन्न नई संभावनाओं पर विचार प्रस्तुत किए।
विभिन्न सत्रों के प्रमुख वक्ताओं में प्रो. देव नाथन, प्रो. एम. एस. पंवार, प्रो. बीना सकलानी, प्रो. विजय एस. सहाय, डॉ. के. आर. नौटियाल, प्रो. एच. सी. पुरोहित, प्रो. अंजलि चौहान और प्रो. रितेश चतुर्वेदी सहित अन्य विद्वान सम्मिलित रहे। इस अवसर पर डॉ. सौम्यता पांडेय द्वारा रचित थारू जनजाति पर पुस्तक का विमोचन भी किया गया।
संगोष्ठी में कई तकनीकी सत्र आयोजित किए गए जिनमें जनजातीय विकास के विविध आयामों पर चर्चा हुई।
प्रथम तकनीकी सत्र में भोटिया, थारू, बुक्सा, जौनसारी और राजी जैसे समुदायों की बदलती आजीविका प्रणालियों पर विचार हुआ। वक्ताओं ने बताया कि वन, ऊँचाई वाले चरागाह, आर्द्रभूमि और सीमापार व्यापार से जुड़े पारंपरिक जीवन-आधार पर्यावरणीय परिवर्तन, बाजार दबावों और नीतिगत प्रतिबंधों के कारण परिवर्तित हो रहे हैं। प्रतिभागियों ने भारत-तिब्बत व्यापार मार्गों के बंद होने के बाद स्थानांतरित पशुपालन में आई गिरावट, चराई प्रतिबंधों और तराई क्षेत्रों में भूमि विखंडन, कृषि लागत में वृद्धि तथा बाजार अस्थिरता जैसी चुनौतियों पर भी प्रकाश डाला। विशेषज्ञों ने कहा कि नीतिगत उपायों को आय-केंद्रित योजनाओं से आगे बढ़कर आजीविका की स्थिरता बढ़ाने वाले संस्थागत सुधार, उद्यम विकास और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप योजना निर्माण पर केंद्रित होना चाहिए।
द्वितीय सत्र में हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिक संवेदनशीलता से निपटने में स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों की भूमिका पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान को केवल सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि नैतिक सहभागिता, सामुदायिक सहमति और संस्थागत मान्यता के साथ शासन ढाँचे में समाहित किया जाना चाहिए। चर्चाओं में यह भी रेखांकित किया गया कि सामुदायिक संसाधन प्रबंधन पद्धतियाँ जलवायु अनुकूलन, जैव विविधता संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग में सहायक हो सकती हैं।
तृतीय सत्र में जनजातीय विकास के सांस्कृतिक और शैक्षिक आयामों पर विचार हुआ। प्रतिभागियों ने चिंता व्यक्त की कि पलायन, शहरी प्रभाव और औपचारिक शिक्षा संरचनाओं के कारण जनजातीय भाषाओं और परंपराओं का पीढ़ीगत हस्तांतरण कमजोर पड़ रहा है। विद्वानों और विशेषज्ञों ने शैक्षिक सुधार, युवा सहभागिता कार्यक्रम और समुदाय-आधारित दस्तावेजीकरण पहल शुरू करने का सुझाव दिया, ताकि विकास सांस्कृतिक क्षरण का कारण न बने। सत्र में इस बात पर बल दिया गया कि नीति ढाँचे ऐसे हों जो आधुनिक अवसरों के साथ पहचान संरक्षण को भी प्रोत्साहित करें।
समापन सत्र में डॉ. अंबेडकर चेयर के प्रो. हर्ष डोभाल ने पूरे दिवस की कार्यवाही का सार प्रस्तुत करते हुए सहभागी शासन और संस्थागत जवाबदेही के महत्व पर बल दिया। उन्होंने कहा कि सह-प्रबंधन राज्य संस्थाओं और स्थानीय समुदायों के बीच वन, भूमि और जल संसाधनों के साझा प्रबंधन का व्यावहारिक ढाँचा प्रदान करता है। उन्होंने ग्राम सभाओं को सशक्त बनाने और स्थानीय शासन संस्थाओं को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता बताई ताकि नीति और क्रियान्वयन के बीच की दूरी कम हो सके।
संगोष्ठी की चर्चाओं का केंद्रीय विचार सह-प्रबंधन रहा, जिसमें भूमि, वन और जल संसाधनों के प्रबंधन में राज्य संस्थाओं और जनजातीय समुदायों की साझी भागीदारी पर बल दिया गया। प्रतिभागियों ने कहा कि प्रगतिशील कानूनी ढाँचे और विकेंद्रीकृत शासन व्यवस्थाओं के बावजूद क्रियान्वयन में अनेक अंतराल बने हुए हैं, जिनमें वन पंचायतों का कमजोर होना, वन अधिकारों का असमान प्रवर्तन और ऊपर से नीचे तक लागू योजना-प्रणाली शामिल हैं। संगोष्ठी में ग्राम सभाओं को सशक्त बनाने, जनजातीय उपयोजना में पारदर्शिता बढ़ाने, विकास और आपदा शमन कार्यक्रमों में समन्वय स्थापित करने तथा स्थानीय पारिस्थितिक और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप जिला-स्तरीय योजनाएँ तैयार करने की सिफारिश की गई।

