उत्तराखंड के पर्वतीय नगरों के लिए जलवायु-संवेदनशील और नागरिक-आधारित शहरी नीति की जरूरत — दून विश्वविद्यालय में IASSI का 24वां वार्षिक सम्मेलन

उत्तराखंड के पर्वतीय नगरों के लिए जलवायु-संवेदनशील और नागरिक-आधारित शहरी नीति की जरूरत — दून विश्वविद्यालय में IASSI का 24वां वार्षिक सम्मेलन
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देहरादून। दून विश्वविद्यालय में आयोजित इंडियन एसोसिएशन ऑफ सोशल साइंस इंस्टिट्यूशन्स (IASSI) के 24वें वार्षिक सम्मेलन में विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं ने उत्तराखंड के पर्वतीय नगरों के लिए एक दूरदर्शी, जलवायु-संवेदनशील (climate-resilient) और नागरिक-आधारित शहरी नीति (urban policy) तैयार करने की आवश्यकता पर बल दिया।

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में उच्च शिक्षा सचिव डॉ. रंजीत सिन्हा ने कहा कि बढ़ते पर्यावरणीय दबाव और शहरी विस्तार को देखते हुए हिमालयी क्षेत्र में सतत विकास की नींव स्थानीय भागीदारी और जलवायु-आधारित शासन पर टिकी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि हम विकास को टिकाऊ बनाना चाहते हैं, तो शासन की हर परत में पर्यावरणीय चेतना को शामिल करना होगा। नागरिकों की भागीदारी, सरकार की जवाबदेही और प्रमाण-आधारित योजना से ही हम अपने नाजुक पारिस्थितिक तंत्र को सुरक्षित रख सकते हैं।

दून विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल ने बिना योजना के हो रहे शहरीकरण पर चिंता जताते हुए कहा कि राज्य के जलवायु-संवेदनशील भविष्य के निर्माण में दूरदर्शी नेतृत्व और समुदाय की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि केवल समावेशी और पर्यावरण-सचेत नीति ढांचा ही पर्वतीय नगरों की विशिष्ट पहचान को सुरक्षित रख सकता है।

प्रो. एस.पी. सती ने हिमालयी संकट पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह क्षेत्र भूस्खलन, ग्लेशियर झील विस्फोट और असामान्य मौसम जैसी जलवायु-जनित आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। उन्होंने कहा कि “हिमालयी विकास मॉडल को यहां की पारिस्थितिक और भौगोलिक वास्तविकताओं के अनुरूप बनाना जरूरी है।”

एसडीसी फाउंडेशन के संस्थापक अनुप नौटियाल ने सामुदायिक भागीदारी आधारित ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के महत्व पर जोर दिया, जबकि डॉ. महेश भट्ट ने पर्यावरणीय गिरावट और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच संबंधों पर चर्चा की।

प्रो. अश्वनी लूथरा ने भू-आकृति-संवेदनशील और टिकाऊ शहरी डिजाइन की वकालत की, वहीं डॉ. ज्योति चांदिरमाणी ने आर्थिक योजनाओं में पर्यावरणीय प्राथमिकताओं को शामिल करने की जरूरत बताई।

डॉ. सुरेंद्र सूथर, डीन (स्कूल ऑफ एनवायरनमेंट एंड नेचुरल रिसोर्सेज), ने कहा कि दीर्घकालिक सतत विकास में शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका महत्वपूर्ण है — “शोध और शिक्षा से ही पर्यावरणीय जिम्मेदारी की संस्कृति विकसित की जा सकती है।”

दिनभर चले सत्रों में जलवायु परिवर्तन, आजीविका सुरक्षा, और क्षेत्रीय पर्यावरणीय चुनौतियों पर विशेषज्ञों ने विचार साझा किए। प्रस्तुतियों में भारत की पर्यावरण नीतियों, विश्वविद्यालय परिसरों में sustainability initiatives, महिलाओं की जलवायु संवेदनशीलता, और BIMSTEC देशों में उत्सर्जन प्रवृत्तियों पर चर्चा हुई।

सत्र का प्रमुख निष्कर्ष रहा कि उत्तराखंड के लिए एकीकृत, समावेशी और नीति-आधारित environmental governance की दिशा में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। विकास का केंद्र sustainability, equity और resilience होना चाहिए, जिसमें environmental justice और gender-sensitive planning को प्रमुखता दी जाए।

यह तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन देशभर से आए 400 से अधिक प्रतिनिधियों की भागीदारी के साथ सतत विकास, जलवायु सहनशीलता, शहरी शासन और आजीविका सुरक्षा जैसे मुद्दों पर केंद्रित है, विशेष रूप से उत्तराखंड के बदलते हिमालयी परिदृश्य के संदर्भ में।

देवभूमि खबर

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