नकल माफिया सरकार पर हावी: भर्ती और परीक्षा घोटालों ने शिक्षा व्यवस्था को किया खोखला
—अखिलेश व्यास —
उत्तराखण्ड। राज्य के गठन के बाद से ही शिक्षा और भर्ती प्रणाली पर नकल और घोटालों का साया लगातार बना रहा है। 2000 में उत्तराखण्ड के गठन के बाद राज्य सरकार ने शिक्षा और सेवाओं में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए, लेकिन प्रशासनिक ढील और भ्रष्टाचार के कारण कई भर्ती घोटाले सामने आए।
विशेषज्ञों के अनुसार, राज्य में शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं में नकल माफिया का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। शुरुआती वर्षों में प्राथमिक स्तर की परीक्षाओं में प्रश्नपत्रों की चोरी और गलत तरीके से रिजल्ट प्रभावित करने के मामले सामने आए। 2010 के बाद से उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) की परीक्षाओं में लगातार प्रश्नपत्र लीक और नकल की घटनाएं सामने आईं। 2015 में आयोजित स्नातक स्तरीय और शिक्षक भर्ती परीक्षाओं में बड़े पैमाने पर नकल और प्रश्नपत्र आउट होने के मामले ने पूरे राज्य में सुर्खियाँ बटोरी।
साल 2020 के आसपास नकल माफिया ने केवल परीक्षा तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि अधिकारियों और नेताओं के माध्यम से सरकारी संस्थानों में अपनी पकड़ मजबूत कर ली। कुछ मामलों में उच्च पदस्थ अधिकारियों की उदासीनता और राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण नकल माफिया खुलेआम सवाल और उत्तर पत्र बाहर भेजने में सफल रहे। इससे केवल छात्रों का भविष्य प्रभावित नहीं हुआ, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़े हुए।
वर्तमान में, स्नातक स्तरीय पदों और अन्य सरकारी भर्ती परीक्षाओं में नकल माफिया लगातार सक्रिय हैं। उदाहरण के लिए, हाल ही में UKSSSC की स्नातक स्तरीय परीक्षा में प्रश्नपत्रों की फोटो सोशल मीडिया पर लीक होना, तथा इसे नकल कराने के उद्देश्य से छात्रों और बाहरी लोगों को भेजा जाना, इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है। पुलिस और एसएसपी देहरादून द्वारा गठित SIT ने अभियुक्तों को गिरफ्तार कर कार्रवाई की, लेकिन यह केवल चोटी का बर्फ है।
विशेषज्ञों का कहना है कि नकल माफिया का प्रभाव केवल परीक्षा तक सीमित नहीं है। यह प्रणाली और छात्रों के भरोसे को कमजोर करता है, ईमानदार अभ्यर्थियों के प्रयास व्यर्थ करता है और समाज में अनुशासन और पारदर्शिता की भावना को भी कमजोर करता है।
शिक्षा विभाग और पुलिस अधिकारियों का कहना है कि कई मामलों में नकल माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है, लेकिन समस्या के स्थायी समाधान के लिए तकनीकी निगरानी, सख्त अनुशासन और प्रशासनिक जवाबदेही को बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो नकल माफिया और भर्ती घोटाले शिक्षा प्रणाली को पूरी तरह खोखला कर देंगे।
उत्तराखंड के गठन से अब तक हुए भर्ती और परीक्षा घोटाले इस बात का प्रमाण हैं कि नकल माफिया केवल छात्रों या परीक्षा तक ही सीमित नहीं रहते, बल्कि वे सरकार और प्रशासन तक अपना प्रभाव बढ़ाते हैं। राज्य में शिक्षा और भर्ती प्रणाली की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए समय रहते सख्त कदम उठाना और पारदर्शिता सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है।

