फूलदेई पर्व की रौनक पड़ने लगी फीकी, देहरी पूजन के लिए कम पहुंच रही बच्चों की टोलियां

फूलदेई पर्व की रौनक पड़ने लगी फीकी, देहरी पूजन के लिए कम पहुंच रही बच्चों की टोलियां
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रिपोर्ट: ललित जोशी।

नैनीताल।सरोवर नगरी नैनीताल सहित पूरे उत्तराखंड में चैत्र मास की शुरुआत के साथ मनाया जाने वाला पारंपरिक लोक पर्व फूलदेई इस वर्ष भी मनाया जा रहा है, लेकिन पहले जैसी रौनक अब कम होती दिखाई दे रही है। कभी बच्चों की टोलियों से गुलजार रहने वाला यह पर्व अब धीरे-धीरे सीमित होता नजर आ रहा है।

फूलदेई पर्व पर छोटे-छोटे बच्चे थाली या रिंगाल की टोकरी में फूल, चावल और हरे पत्ते सजाकर घर-घर जाकर देहरी पूजन करते हैं। बच्चे “फूलदेई छम्मा देई, जतुक देला उतुक सही” जैसे लोकगीत गाते हुए घरों की दहलीज पर फूल और चावल अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। इसके बदले घरों से बच्चों को चावल, गुड़, नारियल और दक्षिणा दी जाती है।

हालांकि इस बार शहर में गिनती की ही बच्चों की टोलियां देहरी पूजन के लिए पहुंचती दिखाई दीं। स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले यह पर्व बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता था, लेकिन बदलती जीवनशैली के कारण इसकी परंपरा धीरे-धीरे कम होती जा रही है।

हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र माह से नववर्ष की शुरुआत मानी जाती है। बसंत ऋतु के आगमन के साथ पहाड़ों में बुरांश, प्योली, आड़ू और खुबानी के फूलों की बहार छा जाती है। इसी प्रकृति उत्सव के रूप में फूलदेई पर्व मनाया जाता है, जिसका सीधा संबंध प्रकृति और पर्यावरण से माना जाता है।
डीएसबी कॉलेज के प्रोफेसर ललित तिवारी के अनुसार फूलदेई पर्व प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, बच्चों में पर्यावरणीय चेतना और सामूहिक खुशियों का प्रतीक है। इस दिन बच्चे बुरांश और प्योली जैसे फूलों को घरों की देहली पर अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। उन्होंने बताया कि यह पर्व नई फसल के आगमन और बसंत ऋतु के स्वागत का भी प्रतीक है।

फूलदेई को लोक बाल पर्व भी कहा जाता है। इस अवसर पर घरों में पारंपरिक व्यंजन जैसे हलवा और स्याही भी बनाए जाते हैं। साथ ही इसी दिन से भिटोली की परंपरा का महीना भी शुरू होता है, जो भाई-बहन के स्नेह और मायके की याद से जुड़ा होता है।

स्थानीय लोगों का मानना है कि इस लोक पर्व की परंपरा को जीवित रखने के लिए समाज और नई पीढ़ी को आगे आकर इसकी सांस्कृतिक विरासत को संजोने की आवश्यकता है।

देवभूमि खबर

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