उत्तराखंड कौथिग में लोकसंस्कृति की छटा, पांडव नृत्य से गढ़वाली रामलीला तक दिखी समृद्ध परंपराओं की झलक

देहरादून। अखिल गढ़वाल सभा की ओर से रेंजर्स कॉलेज ग्राउंड में आयोजित उत्तराखंड कौथिग में उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति, पारंपरिक लोकनृत्यों और पौराणिक गाथाओं की शानदार झलक देखने को मिली। दोपहर से लेकर शाम तक आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों में विभिन्न विद्यालयों, डिग्री कॉलेजों और सांस्कृतिक संस्थाओं के कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। कार्यक्रम में गढ़वाल और कुमाऊं की लोकपरंपराओं के साथ जौनसार-बावर की सांस्कृतिक विरासत भी मंच पर जीवंत हुई।
कार्यक्रम का शुभारंभ देहरादून के पूर्व महापौर सुनील उनियाल गामा ने दीप प्रज्वलित कर किया। इस अवसर पर अखिल गढ़वाल सभा के अध्यक्ष रोशन धस्माना और महासचिव गजेंद्र भंडारी ने दीप प्रज्वलन के साथ अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड कौथिग को जनता का अपार स्नेह मिल रहा है। इसके लिए उन्होंने दर्शकों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि गढ़वाल सभा का प्रयास अपनी समृद्ध पौराणिक संस्कृति और परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की शुरुआत कोल रॉक स्कूल के बच्चों ने की। संस्थापिका इरा कुकरेती के नेतृत्व में विद्यार्थियों ने वीरांगना तीलू रौतेली के जीवन पर आधारित लगभग 30 मिनट की प्रभावशाली नृत्य नाटिका प्रस्तुत की। इसके बाद ब्रह्मकमल संस्था के कलाकारों ने मां नंदा देवी की डोली के साथ ‘जय बोला जय भगवती नन्दा’ गीत पर आकर्षक नृत्य प्रस्तुत किया। माया इंस्टीट्यूट के डिग्री कॉलेज के विद्यार्थियों ने पारंपरिक तांदी नृत्य ‘मोरसिंघ मामा कोईके शुणी जंगू लू’ प्रस्तुत कर लोकसंस्कृति के रंग बिखेरे।
देवभूमि यूनिवर्सिटी के छात्र-छात्राओं ने ‘नारायणी ज्वाला दुर्गा भवानी’ सहित विभिन्न लोकगीतों पर सामूहिक नृत्य प्रस्तुत किया। स्वामी राम हिमालयन यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों ने ‘जो माया’ गीत पर शानदार प्रस्तुति देने के साथ ही कुमाऊं के प्रसिद्ध छोलिया नृत्य से दर्शकों को आकर्षित किया। ब्रह्मकमल संस्था ने छपेली नृत्य ‘पारा भीड़े की बसंती छोरी रमा झंमा’ प्रस्तुत किया। स्पर्श संस्था के कलाकारों ने जौनसारी लोकनृत्य हारुल ‘जौनसार है टांस जमुना के बीच है मेरे बांको’ की प्रस्तुति दी। कार्यक्रम के अंत में ब्रह्मकमल संस्था ने जौनपुरी क्षेत्र का प्रसिद्ध गीत ‘हरसू मामा’ प्रस्तुत कर दर्शकों को तालियां बजाने पर मजबूर कर दिया। कार्यक्रम का संचालन पं. उदय शंकर भट्ट ने किया।
इससे पहले दोपहर दो बजे आयोजित सत्र में रुद्रप्रयाग के बच्छणस्यूं मंडाण समूह ने पांडव नृत्य एवं गैंडा वध का पारंपरिक मंचन किया। इस अनुष्ठानिक लोकनाट्य में पांडवों के पिता महाराज पांडु के श्राद्ध और तर्पण की पौराणिक गाथा को प्रस्तुत किया गया। मान्यता के अनुसार पितरों के तर्पण के लिए गैंडे की खाल और सींग का विशेष महत्व माना जाता था। इसी प्रसंग में अर्जुन पूर्व दिशा की ओर गैंडे की खोज में निकलते हैं, जहां उनका सामना नागार्जुन से होता है। गैंडे के वध के बाद अर्जुन और नागार्जुन के बीच भयंकर युद्ध होता है। इस दौरान नागकन्या के हस्तक्षेप से घटनाक्रम नया मोड़ लेता है और अंततः अर्जुन तथा नागकन्या का विवाह होता है। इसके बाद पांडव महाराज पांडु का श्राद्ध एवं तर्पण करते हैं। इस पूरी लोकगाथा का निर्देशन अंकित रावत ने किया।
उत्तराखंड कौथिग में शाम छह बजे गढ़वाली रामलीला का भव्य मंचन भी किया गया। गढ़वाल की लोकसंस्कृति, भाषा और साहित्य के संरक्षण एवं संवर्द्धन के उद्देश्य से कुलानंद घनशाला द्वारा तैयार इस रामलीला में दर्शकों को लोकभाषा और परंपराओं से जुड़ने का अवसर मिला। गढ़वाली संवादों, लोकगीतों और चौपाइयों से सजी इस प्रस्तुति ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया।
लगभग ढाई घंटे में दस दिनों की रामलीला की कथा को समेटा गया। इसमें 60 लोकधुनों, 450 से अधिक गेय रचनाओं, 125 से अधिक पात्रों और 165 दृश्यों को शामिल किया गया। लेखक एवं निर्देशक कुलानंद घनशाला ने बताया कि यह प्रस्तुति उनके पिछले 40 वर्षों के रंगमंचीय और साहित्यिक अनुभवों का परिणाम है। इसमें गढ़वाल की प्रचलित लोकधुनों के माध्यम से रामकथा को विशिष्ट लोकनाट्य शैली में प्रस्तुत किया गया है।
रामलीला का संगीत निर्देशन लोकगायक ओम बधानी ने किया। गीतों को उत्तराखंड के लोकगायकों नीता कुकरेती, रेखा धस्माना, आशा भट्ट, ओम बधानी, विवेक नौटियाल, चंद्रदत्त सुयाल, अभिनव रावत, राकेश भट्ट, ओमप्रकाश सेमवाल और गिरीश सुंदरियाल सहित अन्य कलाकारों ने स्वर दिए।
इस अवसर पर सभा अध्यक्ष रोशन धस्माना ने कहा कि शिक्षा के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को जोड़ना आवश्यक है। मातृभाषा हमारी पहचान है और लोकभाषाओं का संरक्षण हम सभी की जिम्मेदारी है। महासचिव गजेंद्र भंडारी ने कहा कि बच्चों को अपनी मातृभाषा का ज्ञान होना बेहद जरूरी है। गढ़वाली जैसी लोकभाषाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में रामलीला जैसे सांस्कृतिक आयोजन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सांस्कृतिक सचिव उदय शंकर भट्ट ने भी लोकभाषा के संरक्षण पर जोर दिया। उपाध्यक्ष निर्मला बिष्ट ने गढ़वाली रामलीला को लोकसंस्कृति का भव्य सांस्कृतिक अनुष्ठान बताया।
कार्यक्रम में प्रवक्ता अजय जोशी, सहसचिव संतोष गैरोला, सूर्य प्रकाश भट्ट, वीरेंद्र असवाल, लक्ष्मी बहुगुणा, मुनि राम सकलानी, नंद किशोर हटवाल सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।


