दून विश्वविद्यालय में ‘कास्ट, जेंडर एवं क्लाइमेट जस्टिस’ पर इंटर अम्बेडकर चेयर कोलॉक्वियम आयोजित

दून विश्वविद्यालय में ‘कास्ट, जेंडर एवं क्लाइमेट जस्टिस’ पर इंटर अम्बेडकर चेयर कोलॉक्वियम आयोजित
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देहरादून।दून विश्वविद्यालय के आंतरिक गुणवत्ता प्रकोष्ठ द्वारा विश्वविद्यालय में स्थापित डॉ. अम्बेडकर चेयर तथा पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय में स्थापित डॉ. अम्बेडकर चेयर के मध्य इंटर चेयर कोलॉक्वियम “कास्ट, जेंडर एवं क्लाइमेट जस्टिस” विषय पर आयोजित किया गया। इस संगोष्ठी का उद्देश्य सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता और जलवायु परिवर्तन जैसे समसामयिक मुद्दों पर शैक्षिक एवं शोधपरक विमर्श को प्रोत्साहित करना था।

अतिथियों का स्वागत करते हुए आंतरिक गुणवत्ता प्रकोष्ठ के समन्वयक प्रो. एच.सी. पुरोहित ने कहा कि भीमराव रामजी अम्बेडकर के दर्शन, विचारों और कार्यों पर गहन अध्ययन एवं शोध की दृष्टि से दोनों विश्वविद्यालयों के मध्य शैक्षणिक सहयोग को और सशक्त किया जाएगा। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के संयुक्त प्रयासों से जनसामान्य से जुड़े विषयों के समाधान हेतु प्रभावी एवं दीर्घकालीन रणनीतियाँ विकसित की जा सकेंगी।

पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, भटिंडा के डॉ. अम्बेडकर चेयर के प्रो. कन्हैया त्रिपाठी ने वंचित वर्गों के शैक्षिक उन्नयन की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि महिला सशक्तीकरण तथा जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों के समाधान हेतु सतत एवं समन्वित प्रयास आवश्यक हैं। उन्होंने इस मंच को स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर सार्थक शोध एवं विमर्श के लिए उपयोगी बताया।

प्रो. त्रिपाठी ने उत्तराखण्ड की पर्यावरणीय चेतना का उल्लेख करते हुए गौरा देवी के ऐतिहासिक आंदोलन को विश्व समुदाय के लिए प्रेरणास्रोत बताया। साथ ही उन्होंने सुंदरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट एवं राजेन्द्र सिंह जैसे पर्यावरणविदों के योगदान पर गहन अध्ययन एवं शोध की आवश्यकता पर बल दिया।

दून विश्वविद्यालय के डॉ. अम्बेडकर चेयर के प्रो. हर्षपति डोभाल ने अपने वक्तव्य में कहा कि जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का भी प्रश्न है। इसका प्रभाव समाज के वंचित, दलित, आदिवासी एवं कमजोर वर्गों पर अधिक पड़ता है। उन्होंने कहा कि जलवायु संकट जाति-निरपेक्ष या लैंगिक रूप से तटस्थ नहीं है, बल्कि यह पूर्व से मौजूद सामाजिक असमानताओं को और गहरा करता है।

प्रो. डोभाल ने स्पष्ट किया कि जलवायु न्याय का अर्थ केवल कार्बन उत्सर्जन में कमी नहीं, बल्कि सामाजिक भेदभाव और असमानताओं को दूर करना भी है। उन्होंने विकसित देशों की अधिक जिम्मेदारी पर बल देते हुए कहा कि दीर्घकालीन समाधान हेतु वैश्विक सहयोग आवश्यक है। साथ ही, नीति-निर्माण की प्रक्रिया में वंचित समुदायों एवं महिलाओं की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. हिमानी शर्मा ने किया।

संगोष्ठी में डॉ. चेतना पोखरियाल, डॉ. नरेन्द्र रावल, डॉ. आबसार अब्बासी, डॉ. राजेश भट्ट, एस.पी. खाली, डॉ. गजाला खान, डॉ. अदिति बिष्ट, दिव्यांजलि बिंजलवाण, पियूष, डॉ. मानवेन्द्र बर्तवाल, हिमांशु कुकशाल, माधवा नन्द चमोली, शिल्पी तिवाड़ी सहित शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।

देवभूमि खबर

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