एचआईवी की रोकथाम के लिए संबंधित समुदाय के व्यक्ति की भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक: सुरेखा डंगवाल

एचआईवी की रोकथाम के लिए संबंधित समुदाय के व्यक्ति की भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक: सुरेखा डंगवाल
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देहरादून।दून विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग के द्वारा विश्व एड्स दिवस के अवसर पर विश्वविद्यालय स्तर पर एक जागरूकता कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम में विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं शिक्षकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया.

दून विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर सुरेखा डंगवाल ने अपने संदेश में कहा कि यूएन एड्स के द्वारा इस वर्ष की थीम “समुदाय को नेतृत्व करने दे” पर आधारित है. किसी भी समुदाय के द्वारा किया गया कार्य अधिक प्रभावी होता है क्योंकि लोग अपने समुदाय के व्यक्ति की बातों को ज्यादा गंभीरता के साथ लेते हैं. एचआईवी के प्रसार को नियंत्रित करने और जागरूकता फैलाने के लिए महिला/ पुरुष यौन कर्मी, एमएसएम, सुई से नशा करने वाले और ट्रांसजेंडर की कम्युनिटी से व्यक्तियों को सम्मिलित करना, सशक्त करना, बजट उपलब्ध कराना, निगरानी करने के साथ-साथ एक वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन प्रणाली स्थापित करने की अति आवश्यकता है तभी समाज के अंतिम छोर पर जो वंचित व्यक्ति बैठा है उसे तक पहुंच बन पाएगी. एचआईवी के संदर्भ में किसी भी समुदाय के व्यक्ति को सशक्त बनाने के लिए आवश्यक है कि उन्हें अधिकार, संसाधन, जिम्मेदारी और कानूनी मान्यता दे दी जाए क्योंकि एचआईवी की जागरूकता को फैलाने के लिए संबंधित समुदाय के लोग ज्यादा प्रभावी हो सकते हैं.

दून विश्वविद्यालय के वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक डॉ राजेश भट्ट ने कहा कि एचआईवी कोई जेनेटिक बीमारी नहीं है बल्कि व्यक्ति इसे अपने व्यवहार से अर्जित करता है इसीलिए यह जरूरी हो जाता है कि व्यक्ति अपने व्यवहार पर नियंत्रण करें. व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए “बिहेवियर मोडिफिकेशन” तकनीक का इस्तेमाल किया जा सकता है जिसके लिए सबसे पहले इस बात के लिए “जागरूक (अवेयरनेस)” करने की जरूरत है कि किस व्यवहार से एचआईवी शरीर में प्रवेश कर सकता है. दूसरा चरण है “तैयारी (प्रिपरेशन)” का जिसमें व्यक्ति उन तरीकों को खोजना है जिससे वह अपने आप को एचआईवी से बचा सकता हूं. तीसरा चरण है “कार्य (एक्शन)” करने का जिसमें व्यक्ति कुछ निर्णय लेने के बाद उन पर कार्य करता है जैसे की एक विश्वसनीय पार्टनर के साथ ही यौन संबंध में सम्मिलित होना या निरंतर कंडोम का इस्तेमाल करना. इसका अंतिम और चौथा चरण “संपोषण (मेंटेनेंस)” है जिसमें व्यक्ति अपने लिए बनाए गए एक्शन प्लान या नियमों को को लगातार बनाए रखना है.

डॉ सविता तिवारी कर्नाटक ने अपने उद्बोधन में कहा कि एचआईवी के प्रसार को रोकने के लिए जागरूकता अभियान एक प्रमुख हथियार है. जागरूकता की कमी के कारण से लोग जोखिम भरे व्यवहार करते हैं परिणाम स्वरुप एचआईवी के जीवन में आने की संभावना बढ़ जाती है. एचआईवी का ट्रीटमेंट सरकार के द्वारा निशुल्क दिया जाता है और यह ट्रीटमेंट बहुत प्रभावकारी है. इससे पीएलएचआईवी लोगों की जीवन प्रत्याशा बड़ी है. शीघ्र ही दून विश्वविद्यालय का मनोविज्ञान विभाग अपने सभी विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए एचआईवी एड्स केंद्रित काउंसलिंग के लिए ट्रेनिंग का आयोजन कराएगा ताकि विद्यार्थी इस क्षेत्र में काउंसलिंग करने के लिए निपुण हो सके.

इस जागरूकता कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया एवं अपनी बात रखी. संध्या ने बताया कि एचआईवी और एड्स में क्या अंतर है? मनस्वी ने बात पर प्रकाश डाला कि एचआईवी एचआईवी का प्रसार किस तरीके से हो सकता है एवं उसका किस तरीके से बचाव कर सकते हैं. आराध्या ध्यानी ने बताया कि किस प्रकार से “कलंक और भेदभाव” संक्रमित व्यक्ति को काउंसलिंग और मेडिकल सेवाओं से वंचित रख देते हैं. कनक थपलियाल ने ट्रांसजेंडर के साथ होने वाली समस्याओं और भेदभाव के बारे में खुलकर बात की. समर्थ काला ने एचआईवी से बचाव के लिए “एबीसी मॉडल” की चर्चा की जिसके अंतर्गत उन्होंने बताया कि ए” का मतलब है- एब्सटीनेंस यानी की यौन संबंध बनाने से परहेज किया जाए. “बी” का मतलब है- बी फेथफुल यानी की अपने एक पार्टनर के प्रति विश्वासनीय रहे और “सी” का मतलब है कंडोम का करेक्ट (सही) एंड कंसिस्टेंट (निरंतर) प्रयोग.

इस कार्यक्रम के दौरान डॉ स्वाति सिंह, डॉ कल्पना रावत, रिचा नेगी, अक्षरा शर्मा, दीपक कुमार, आयुषी पंडवाल, अनामिका भारद्वाज, अंजली सुयाल आदि अनेक फैकल्टी, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे.

देवभूमि खबर

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