बुजुर्गों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार के बारे में संवाद से बढ़ेगी जागरूकता: प्रोफेसर सुरेखा डंगवाल

बुजुर्गों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार के बारे में संवाद से बढ़ेगी जागरूकता: प्रोफेसर सुरेखा डंगवाल
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देहरादून । दून विश्वविद्यालय में आजादी की अमृत महोत्सव के अंतर्गत समाज कार्य विभाग और मनोविज्ञान विभाग ने संयुक्त रूप से हेल्पएज इंडिया के सहयोग से “विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस” ​​पर एक जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया। इस वर्ष के लिए इस कार्यक्रम का विषय “bridge the Gap” (“अंतराल को पाटना”) था। इस कार्यक्रम में बुजुर्गों पर होने वाले विभिन्न प्रतिकूल व्यवहारों पर चर्चा की गई।

दून विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल ने कहा कि आज के युवाओं को बुजुर्गों की जरूरतों के बारे में समझ विकसित करनी चाहिए और उन्हें सम्मान के साथ-साथ सामाजिक स्वीकृति भी देनी चाहिए। ऐसा करने के लिए आवश्यक है कि आज के युवा बुजुर्गों के प्रति संवेदनशील बने। किसी भी समस्या से निपटने के लिए सबसे पहला कदम होता है कि समस्या के प्रति स्वीकार भाव का आना क्योंकि इसके उपरांत ही समाधान को खोजा जा सकता है. आज भी बहुत से लोगों को इस बात का एहसास नहीं है कि घरों के अंदर बुजुर्गों के साथ कई तरह का दुर्व्यवहार होता है। आजकल लोग बुजुर्गों को घर में एक बोझ की तरह देखते हैं और उन्हें ओल्ड एज होम भेजना चाहते हैं। भारतीय परंपरा कभी भी ऐसी नहीं थी। वृद्धावस्था अधिक मात्रा में मनोवैज्ञानिक और शारीरिक देखभाल और समर्थन चाहती है इसके अभाव में व्यक्ति कई तरह की मानसिक और शारीरिक समस्याओं का सामना कर सकता है।

हेल्पएज इंडिया के राज्य प्रमुख श्री चैतन्य कुछ चौंकाने वाले तथ्यों को सामने लाती है और हमें उस ढांचे पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर करती है जिसके माध्यम से हम अपने बुजुर्गों को देखते हैं। बुजुर्ग आज काम करने के इच्छुक हैं, वे केवल आश्रितों के रूप में नहीं, बल्कि समाज के योगदानकर्ता सदस्यों के रूप में देखना चाहते हैं। इसलिए, यह महत्वपूर्ण है कि गरीबों और वंचितों के लिए सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के साथ-साथ, हम वरिष्ठ नागरिकों के एक बड़े वर्ग के लिए एक सक्षम वातावरण तैयार करते हैं जो दीर्घायु लाभांश को प्राप्त करने में योगदान देने के इच्छुक और सक्षम हैं। इस बीच, परिवार वरिष्ठ नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। हमें देखभाल करने वाली पारिवारिक संस्था का पोषण और समर्थन करना जारी रखना चाहिए। महामारी के बाद, स्वास्थ्य, आय, रोजगार और सामाजिक और डिजिटल समावेशन प्रमुख क्षेत्र बन गए हैं, जिसमें बुजुर्गों के लिए सम्मानजनक जीवन जीने के लिए सामाजिक और नीति दोनों स्तरों पर अंतराल को संबोधित करने की आवश्यकता है। इसलिए हमने इस वर्ष का विषय ब्रिज द गैप रखा है।
प्रो. हर्ष डोभाल ने कुछ उदाहरणों के साथ बुजुर्गों की सामाजिक परिप्रेक्ष्य में बात की। उन्होंने कहा कि हमें अपने बच्चों के सामने अपने माता-पिता का उचित तरीके से पालन पोषण कर एक उदाहरण पेश करना चाहिए ताकि वह हमारे व्यवहार को देखें और सीखें।

मनोविज्ञान विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ राजेश भट्ट ने बुजुर्गों के मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में समझ विकसित की। उन्होंने बताया कि बुजुर्गों में होने वाली मानसिक समस्याओं के बारे में आज भी लोग बात नहीं करते हैं। काउंसलिंग सेवाओं के लिए इको सिस्टम डिवेलप करने की जरूरत है क्योंकि आने वाले समय में जैसे जैसे बुजुर्गों की संख्या बढ़ेगी उसी अनुपात में हस्तक्षेप प्रोग्राम चलाने की आवश्यकता पड़ेगी. उम्र बढ़ने के साथ-साथ शारीरिक और मानसिक क्षमताओं का ह्रास होता है और कई बार आर्थिक समस्याएं भी आ जाती हैं।

इस जागरूकता कार्यक्रम में आय & रोजगार, स्वास्थ्य देखभाल, बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार, सामाजिक समावेश, डिजिटल साक्षरता समेत बुजुर्गों से जुड़े मुद्दों पर खुली चर्चा हुई. खुली चर्चा के दौरान विभिन्न बुजुर्गों के साथ-साथ युवाओं ने भी इस बारे में अपने-अपने विचार तथा अपने सुझाव रखे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. नरेश मिश्रा ने किया। इस कार्यक्रम में दून विश्वविद्यालय के कुछ संकायों, सामाजिक कार्य और मनोविज्ञान के छात्रों, वरिष्ठ नागरिकों के साथ-साथ हेल्पेज इंडिया के सहयोगी सदस्यों ने भाग लिया।

देवभूमि खबर

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