श्रीदेव सुमन के सिद्धांतों और विचारों को आगे बढ़ाने की आवश्यकता

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रुद्रप्रयाग।देवभूमि खबर। श्रीदेव सुमन की 104वीं जयंती पर जन अधिकार मंच की ओर से विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस मौके पर वक्ताओं ने सुमन के विचारों, मूल्यों और सिद्धांतों को आगे बढ़ाने पर जोर दिया।
बद्री केदार मंदिर समिति में आयोजित विचार गोष्ठी में वरिष्ठ पत्रकार श्याम लाल सुंदरियाल ने कहा कि टिहरी की जनता को राजशाही से मुक्त कराने में श्रीदेव सुमन का अभूतपूर्व योगदान रहा था। तमाम यातनाओं के बाजवूद उन्होंने पूरे जज्बे के साथ जनांदोलन छेड़ा की। उन्होंने कहा कि भले ही श्रीदेव सुमन आज हमारे बीच नही है, लेकिन उनके विचार और मूल्य हमेशा हमें प्रेरणा देते रहेंगे। मंच के अध्यक्ष मोहित डिमरी ने श्रीदेव सुमन को उत्तराखंड का भगत सिंह बताया। उन्होंने कहा कि देश आजादी में जो योगदान भगत सिंह का था, ठीक वैसा ही योगदान भगत सिंह का टिहरी की जनता को राजशाही से मुक्त करने में था। इसे संयोग ही कहेंगे कि जिस तरह भगत सिंह की मौत के बाद उनके शव को नदी में फेंक दिया गया था, ठीक उसी तरह उनके शव को भी नदी में डाल दिया गया। उन्होंने कहा कि अगर हम भगत सिंह और श्रीदेव सुमन की जीवनी का गहराई से अध्ययन करेंगे तो पायेंगे कि दोनों में काफी कुछ समान था।
मंच के सह सचिव राय सिंह रावत और राय सिंह बिष्ट ने कहा कि श्रीदेव सुमन ने देश आजादी के साथ ही टिहरी राजशाही के खिलाफ आंदोलन का बिगुल फूंका। उन्होंने राजशाही से जनता को मुक्ति दिलाने के लिए अपना पूरा जीवन ही न्यौछावर कर दिया। जनाधिकार मंच के संस्थापक सदस्य केपी ढौंडियाल और कृष्णानंद डिमरी ने कहा कि उत्तराखंड की भूमि में कई वीरों ने जन्म लिया है। आज भले ही हमारे बीच कई महान विभूतियां नहीं हैं लेकिन उनके कार्य हमेशा प्रेरणापुंज का काम करती रहेंगी। सामाजिक कार्यकर्ता देवेन्द्र चमोली और रमेश नौटियाल ने कहा कि उत्तराखंड को माफिया तंत्र से मुक्ति के लिए एक और श्रीदेव सुमन की आवश्यकता है। उत्तराखंड की माटी में समय-समय पर युग पुरूष पैदा हुए और उन्होंने अपना योगदान दिया। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ी को हमारे इतिहास पुरूषों की जानकारी हो, इसके लिए इस तरह के कार्यक्रम जरूरी हैं। गोष्ठी का संचालन करते हुए सत्यपाल नेगी ने कहा कि टिहरी राजशासी के खिलाफ झंडा बुलंद करने का खामियाजा श्रीदेव सुमन को भुगतना पड़ा। उन्हें जेल में प्रताड़ित किया जाता था और यातनाए दी जाती हैं। उनके बलिदान के बाद टिहरी की जनता को राजशाही से मुक्ति मिली। इस मौके पर परमानंद गौड़, केशव नौटियाल, कल्पेश्वर नौटियाल समेत अन्य लोग मौजूद थे।

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