‘समाज में समानता के लिए बंधुत्व आवश्यक”:न्यायमूर्ति सुधांसु धूलिया

‘समाज में समानता के लिए बंधुत्व आवश्यक”:न्यायमूर्ति सुधांसु धूलिया
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देहरादून ।दून विश्वविद्यालय में डॉ. आंबेडकर चेयर द्वारा आज भारत रत्न बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की 135वीं जयंती के अवसर पर एक प्रतिष्ठित दिवसीय अकादमिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने “भारतीय संविधान और बाबासाहेब डॉ. बी.आर. आंबेडकर” विषय पर गहन व्याख्यान प्रस्तुत किया।

सीनेट हॉल में उपस्थित बड़ी संख्या में श्रोताओं को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति धूलिया ने डॉ. बी.आर. आंबेडकर की प्रतिभा तथा भारतीय संविधान की आध्यात्मिक और सामाजिक नींव पर विस्तृत प्रकाश डाला। अपने वक्तव्य के एक महत्वपूर्ण क्षण में उन्होंने डॉ. आंबेडकर की बंधुत्व की अवधारणा को पश्चिमी राजनीतिक मॉडलों से अलग करते हुए कहा कि जहाँ फ्रांसीसी क्रांति ने “स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व” को एक राजनीतिक लक्ष्य के रूप में लोकप्रिय बनाया, वहीं आंबेडकर की दृष्टि भारतीय समाज के मानस में गहराई से निहित थी।

दून विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर सुरेखा डंगवाल ने अपने स्वागत भाषण में डॉ. आंबेडकर के योगदान को केवल संविधान के प्रमुख शिल्पकार तक सीमित न रखते हुए उन्हें महिलाओं के अधिकारों के लिए निरंतर संघर्ष करने वाला योद्धा बताया। विशिष्ट अतिथि, शिक्षाविदों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों का स्वागत करते हुए उन्होंने विश्वविद्यालय की विविध छात्र-समुदाय पर गर्व व्यक्त किया और विशेष रूप से छात्राओं की मजबूत उपस्थिति को आंबेडकर के सामाजिक सशक्तिकरण के दृष्टिकोण का प्रतिबिंब बताया।

डॉ. आंबेडकर की अवधारणा को विस्तार से समझाते हुए न्यायमूर्ति धूलिया ने कहा, “डॉ. आंबेडकर के लिए बंधुत्व फ्रांसीसी क्रांति से लिया गया कोई राजनीतिक विचार नहीं था। वे इसे ‘बंधुत्व’ या ‘मैत्री’ के रूप में देखते थे—जो भारतीय परंपरा में गहराई से निहित है।”

उन्होंने कहा, “कानून समानता सुनिश्चित कर सकता है, लेकिन केवल भाईचारे की भावना ही उसे सुरक्षित रख सकती है। बंधुत्व निस्वार्थता की अभिव्यक्ति है; यह दूसरों के लिए वही महसूस करना है जो हम अपने लिए करते हैं।” न्यायमूर्ति धूलिया ने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे 8 नवम्बर 1948 और 25 नवम्बर 1949 को डॉ. आंबेडकर के ऐतिहासिक भाषणों का अध्ययन करें, ताकि स्वतंत्रता के समय भारत की “नवजात” अवस्था और मूल्य-आधारित विस्तृत संविधान की आवश्यकता को समझा जा सके।

डॉ. आंबेडकर के जीवन में “पुस्तकों की संगति” को याद करते हुए न्यायमूर्ति धूलिया ने विद्यार्थियों को समय का सदुपयोग करने और ज्ञान के प्रति अकादमिक भूख विकसित करने की सलाह दी। उन्होंने छात्रों को नव-यथार्थवादी सिनेमा और सत्यजीत रे के कार्यों को देखने के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि कला संवेदनशीलता विकसित करने और सभी जीवों की गरिमा को समझने के लिए आवश्यक है।

स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के डीन प्रोफेसर राजेंद्र प्रसाद. मंमगाई ने डॉ. बी.आर. आंबेडकर को दूरदर्शी समाज सुधारक बताते हुए कहा कि उनके आर्थिक और सामाजिक दृष्टिकोण आज भी आधुनिक और प्रगतिशील भारत के लिए अत्यंत प्रासंगिक हैं। उन्होंने लैंगिक न्याय के क्षेत्र में आंबेडकर की अग्रणी भूमिका—विशेषकर हिंदू कोड बिल और मातृत्व लाभ की व्यवस्था—को रेखांकित किया। साथ ही उन्होंने सहकारी खेती और तकनीकी उन्नति को औद्योगिक विकास की आधारशिला के रूप में प्रस्तुत करने की आंबेडकर की दूरदर्शी सोच का उल्लेख किया।

समकालीन चुनौतियों का उल्लेख करते हुए प्रोफेसर मंमगाई ने कहा कि आंबेडकर की “आर्थिक लोकतंत्र” की अवधारणा आज बढ़ती आय असमानता और रोजगार असुरक्षा जैसी समस्याओं से निपटने के लिए महत्वपूर्ण ढांचा प्रदान करती है।

डॉ. आंबेडकर चेयर के प्रोफेसर हर्ष डोभाल ने कहा कि बाबासाहेब डॉ. बी.आर. आंबेडकर के योगदान को केवल संविधान निर्माता या वंचितों के नेता तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आंबेडकर की दृष्टि महिलाओं के अधिकार, आर्थिक नियोजन, जल प्रबंधन, श्रम कल्याण और सामाजिक लोकतंत्र तक विस्तृत थी, जो आज भी अत्यंत प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि लैंगिक समानता, औद्योगीकरण, संसाधनों के न्यायसंगत वितरण और श्रम की गरिमा पर आंबेडकर का जोर एक न्यायपूर्ण और समावेशी समाज के लिए व्यापक दृष्टि प्रस्तुत करता है।

प्रोफेसर आशीष कुमार ने डॉ. बी.आर. आंबेडकर पर आधारित पुस्तकों और विद्वतापूर्ण साहित्य के अध्ययन के महत्व पर बल दिया और विद्यार्थियों को आलोचनात्मक पठन की आदत विकसित करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि आंबेडकर के लेखन की गहरी समझ भारतीय लोकतंत्र, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक वास्तविकताओं को समझने में सहायक है।

इस संगोष्ठी में बड़ी संख्या में शिक्षाविदों और विद्यार्थियों ने भाग लिया, जिनमें विंग कमांडर अनुपमा जोशी, इतिहासकार योगेश धसमाना, प्रोफेसर चेतना पोखरियाल, प्रोफेसर अचलेश डावेरे, प्रोफेसर हिमानी शर्मा, डॉ. मानवेंद्र बर्तवाल, डॉ. सौम्यता पांडे, डॉ. राजेश भट्ट, डॉ. कैलाश कंडवाल, डॉ. ऋचा जोशी पांडे, सुश्री देवयांजलि बिजलवान, डॉ. करुणा शर्मा, सुश्री आब्सार अब्बासी, डॉ. खुशबू, डॉ. वंदना नौटियाल, डॉ. गीतू शर्मा, श्री लव मोहन शर्मा सहित अन्य उपस्थित रहे।

देवभूमि खबर

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